जनगणना क्यों नहीं करा रही सरकार, क्या होंगे देरी के साइड इफेक्ट ?

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ये साल 1881 की बात है। भारत में पहली बार जनगणना हुई थी। सैकड़ों लोगों ने घर-घर जाकर क़रीब 25 करोड़ लोगों से उनके बारे में कई सवाल पूछे। इनमें कई सवाल बहुत पेचीदा भी थे। ये ब्रितानी भारत की पहली जनगणना थी। अगले 130 सालों के सफ़र में भारत में काफ़ी कुछ हुआ, इसी दौरान भारत साल 1947 में आज़ाद भी हुआ। आज़ाद भारत ने पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध का सामना भी किया। सामाजिक और आर्थिक संकट भी समय-समय पर आते गए, लेकिन इस दौरान भारत में जनगणना का सिलसिला हर दस साल में एक बार जारी रहा।

लेकिन पहली बार ऐसा है कि हर दशक में होने वाली जगणना में देरी हो रही है, जो जनगणना 2021 में होने वाली थी, वो अभी तक नहीं हुई है और कब होगी, इसको लेकर भी स्पष्टता नहीं है। इस देरी के कुछ साइड इफेक्ट भी हैं पहले देरी क्यों हुई, इस पर बात कर लेते हैं। 

साल 2011 में देश में आखिरी बार जनगणना हुई थी, नियम के मुताबिक, साल 2021 में जनगणना होनी थी, जिसके लिए सेंटर ने साल 2019 में जनगणना को लेकर बजट जारी किया। साथ ही लगभग 32 लाख लोगों की मुस्तैदी भी कर दी गई जनगणना को लेकर... इतना होने के बाद तो तय था कि साल 2021 में जनगणना होकर आंकड़े भी आ जाएंगे, लेकिन फिर कोविड महामारी आई, जिसने करीब-करीब पूरी दुनिया के सारे कामकाज को ठप्प कर दिया और ये सर्वे भी टल गया। जिसके बाद अप्रैल 2020 में जनगणना का काम शुरू होने वाला था, लेकिन कोविड की वजह से आगे सरक गया। द हिंदू ने एडिशनल रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के हवाले से बताया कि जनगणना अब अक्टूबर 2024 से पहले शायद ही हो। इसकी वजह कुछ ही समय में होने वाला लोकसभा चुनाव भी हैं। ऐसा पहली बार हुआ था. इससे पहले कई संकटों के समय भी सेंसस थोड़ा आगे-पीछे हुआ था, लेकिन रुका नहीं था। 

 

अब बात करते हैं कि क्या होता है सेंसस में... दुनिया भर में लगभग सारे ही देशों में हर एक दशक बाद ये देखा जाता है कि किसी इलाके में कितने लोग रहते हैं। इसमें कई दूसरे पैटर्न भी देखे जाते हैं, जैसे आर्थिक और धार्मिक-सामाजिक स्थिति... इसमें ये भी दिखता है कि कितने लोगों ने अपनी जगहों से पलायन किया। भाषा, कल्चर, साक्षरता, डिसएबिलिटी, उम्र, लिंग जैसी बातें भी इसमें देखी जाती हैं। देश की जनगणना, जनगणना अधिनियम-1948 के तहत कराई जाती है। ये सारी रिपोर्ट ऑफिस ऑफ द रजिस्ट्रार जनरल एंड सेंसस कमिश्नर (ORGI) के पास रहती है, जो गृह मंत्रालय के अंडर आता है।

जनगणना में देरी होने के कुछ साइड इफेक्ट भी हैं, इसमें सबसे अहम चीज है- बजट का आवंटन... कोई भी सरकारी स्कीम या योजना इसी को देखते हुए काम करती है। अगर असल डेटा ही अपडेट नहीं होगा तो बहुत से ऐसे परिवार होंगे, जिन्हें सरकारी सुविधाओं का फायदा नहीं मिल सकेगा। सरकार अब भी साल 2011 के मुताबिक, रिसोर्स दे रही है, इससे करोड़ों लोग कई जरूरी स्कीम्स से बाहर छूट रहे होंगे। इससे प्रस्तावित महिला आरक्षण पर भी असर होगा।

भारत में जनगणना, जनसंख्या विशेषताओं के साथ दिया जाने वाला आंकड़ों का सबसे विश्वस‍नीय स्रोत है। भारत में जनगणना किस तरह से की जाती है, इसे कौन करता है, हमारे बारे में ली गई जानकारी कितनी सुरक्षित होती है और कैसे गिने जाते हैं हम... ये भी समझ लीजिए 

भारत में जनगणना का काम इसके लिए विधिवत नियुक्त किए गए सरकारी कर्मचारी करते हैं। इसके लिए तैनात Enumerators हर घर में जाकर आवश्यक जानकारी जुटाते हैं। ये लोग एक पहचान पत्र और एक नियुक्ति पत्र लेकर आपके घर आएंगे। हां, आपको अगर लगे तो आप जनगणना के दौरान उनसे उनके दस्तावेज़ दिखाने के लिए कह सकते हैं। इस मामले में स्थानीय तहसीलदार से भी संपर्क किया जा सकता है।

जनगणना के लिए हर घर से दो फार्म भरे जाएंगे। इसमें सबसे पहले हाउसिंग सेंसस होगा। इसमें भवन निर्माण सामग्री, घरों का उपयोग, पेयजल, उपलब्धता और शौचालय, बिजली, संपत्ति पर कब्जे जैसे 35 सवाल होंगे। इसके बाद दूसरा रूप राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर से संबंधित है। जनगणना प्रक्रिया के दौरान तैनात कर्मचारी हर घर में जाकर उनसे जनगणना के लिए जरूरी सभी जानकारियां, वो लोगों से जनगणना फॉर्म्स को भरकर इकट्ठा करेंगे। इस प्रक्रिया में लोगों के बारे में जुटाई गई जानकारी को पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता है।

फॉर्म्स को देशभर के 15 शहरों में बने डाटा प्रोसेसिंग सेंटर्स तक पहुंचाया जाता है। ये Data Processing Sophisticated Intelligent Character Recognition Software (ICR) के इस्तेमाल से की जाती है। इस टेक्नोलॉजी का भारत में साल 2001 की जनगणना में पहली बार इस्तेमाल किया गया था, जो दुनिया भर में सेंसस के लिए बेंचमार्क बन गया है।

हालांकि, साल 2021 के लिए प्रस्तावित सेंसस के बारे में भी कहा जा रहा था कि वो डिजिटल होगा। साथ ही इसमें ट्रांसजेंडरों के लिए भी अलग कॉलम की बात थी। इससे पहले सिर्फ पुरुष और महिला की गणना होती रही। डिजिटल सेंसस में जनगणना करने वाले घर-घर तो जाएंगे लेकिन हाथ से फॉर्म भरने की बजाए डिटेल्स को स्मार्टफोन और टैबलेट पर भरा जाएगा। ये सारी जानकारी पोर्टल तक चली जाएगी। कहा जा रहा था कि इसमें सेल्फ-इन्युमरेशन का भी विकल्प होगा, मतलब लोग खुद अपनी जानकारी डालकर उसे सबमिट कर सकेंगे। इसके लिए जनगणना पोर्टल पर मोबाइल नंबर डालकर लॉग इन करना होगा। स्वगणना का डेटा अपने-आप ऑनलाइन सिंक हो जाएगा। ये प्रोसेस ज्यादा तेज होगी। 

वैसे कोविड के दौरान ही अमेरिका भी पहली बार डिजिटल सेंसस सर्वे कर चुका। इसके बाद यूके और फिर चीन ने भी डिजिटल सर्वे किया। यूनाइटेड नेशन्स स्टेटिस्टिक्स डिवीजन ने बताया था कि कोविड के चलते 18 देशों ने अपनी जनगणना को साल 2021 के लिए टाल दिया था, जबकि कुछ देशों ने साल 2022 तक के लिए मामला आगे बढ़ा दिया था। भारत ने सर्वे स्थगित कर दिया, लेकिन अब तक कोई नई तारीख जारी नहीं हो सकी है।

 

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