India में Uniform Civil Code क्यों है जरूरी, संविधान सभा में अलाउद्दीन खिलजी का नाम क्यों था उछला?

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 देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। सरकार संसद के मॉनसून सत्र में इससे जुड़ा बिल भी ला सकती है। ऐसे में 2024 लोकसभा चुनाव से पहले ये बड़ा सियासी मुद्दा बन सकता है, लेकिन ये मुद्दा कानून या संविधान के स्तर पर कोई नया नहीं है। ये बहस 75 साल पुरानी है। संविधान सभा और सुप्रीम कोर्ट से लेकर सियासी मंच तक, ऐसा कोई भी नहीं बचा है जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड पर अपनी अलग-अलग राय न रही हो। क्या आपको पता है संविधान सभा पर यूसीसी को लेकर क्या बहस हुई थी और संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर ने क्या कहा था और इसको लेकर हुई बहस में कैसे अलाउद्दीन खिलजी तक का जिक्र आया था?  

 जब संविधान सभा नागरिकों के अधिकारों का ड्राफ्ट तैयार कर रही थी तो तय हुआ कि पहले चरण में सभी मेंबर अपने-अपने ड्राफ्ट अधिकारों वाली उपसमिति के सामने रखें। साथ ही ये भी फैसला लिया गया कि अधिकारों को दो भागों में बांटा जाए। पहला वो अधिकार, जिनकी गारंटी राज्यों के लिए जरूरी हो और जिन्हें कोर्ट से लागू कराया जा सके, उन्हें एक हिस्से में रखा जाना चाहिए। वहीं दूसरे हिस्से में उन अधिकारों को रखा जाना चाहिए, जिनका पालन करना राज्य की जिम्मेदारी पर छोड़ दिया जाए यानी इन अधिकारों की मांग को पूरा करने के लिए कोई न्यायिक बाध्यता नहीं होगी। 1948 में डॉ. भीमराव आंबेडकर, केएम मुंशी और मुंबई से संविधान सभा के सदस्य कांग्रेसी मीनू मसानी ने अधिकारों वाली उपसमिति के सामने जो ड्राफ्ट पेश किया, उसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड को भी शामिल किया। उप समिति ने अपनी जो रिपोर्ट रखी, उसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड को दूसरे हिस्से यानी गैर-न्यायिक अधिकारों को शामिल करने की सिफारिश की। इस पर मीनू मसानी, हंसा मेहता और अमृत कौर ने आपत्ति जताते हुए कहा कि जो मुद्दे भारत को भारतीयता की ओर बढ़ने में बाधक हैं, उनमें से एक मसला पर्सनल लॉ का भी है। ये जीवन के कई पहलुओं में देश को अलग-अलग टुकड़ों में बांटकर रखेगा।  

मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि नहीं चाहते थे UCC संविधान का हिस्सा बने

4 नवंबर, 1948 को आंबेडकर ने संविधान का जो ड्राफ्ट Article 35 के रूप में पेश किया, उसमें इसे गैर-न्यायिक अधिकारों की लिस्ट यानी नीति निर्देशक तत्वों में रखा गया। इसकी भाषा कुछ इस तरह थी, राज्य भारत के पूरे क्षेत्र के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, लेकिन, मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि नहीं चाहते थे कि ये संविधान का हिस्सा बने। इसलिए इस प्रावधान को शामिल करने को लेकर 23 नवंबर 1948 को पहली बार संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का मसला उठा। संविधान सभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध सबसे पहले मद्रास के सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने किया। वो पांच मुस्लिम सदस्यों के ग्रुप में शामिल थे, जो यूसीसी के खिलाफ संशोधन लेकर आए थे। मोहम्मद इस्माइल का कहना था कि इस आर्टिकल में एक शर्त जोड़ी जानी चाहिए कि, ऐसे किसी कानून की स्थिति में, लोगों या किसी समुदाय को अपने पर्सनल लॉ को छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। इस्माइल ने कहा कि पर्सनल लॉ लोगों की धार्मिक आस्था का मामला है जो सदियों से चला आ रहा है। इसे छेड़ा नहीं जाना चाहिए।  

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल की दिलाई याद 

यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में सबसे जोरदार बहस डॉ. भीमराव आंबेडकर, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की तरफ से की गई। केएम मुंशी ने तर्क दिया कि जिस धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की बात की जा रही है, वो भी राज्य को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने की आजादी देता है। अगर ये प्रावधान संविधान में नहीं रखा जाता है तो भी संसद को भविष्य में ऐसा कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा। जो लोग सिविल कोड को अल्पसंख्यकों के लिए तानाशाही बता रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि आधुनिक मुस्लिम देशों में अलग अधिकार नहीं दिए गए हैं। तुर्की और मिस्र जैसे देश इसके उदाहरण हैं। मुंशी ने अंग्रेजों की नीति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों और उनकी अदालतों ने जानबूझकर ये भावना पैदा की थी कि पर्सनल लॉ हमारे धर्म का हिस्सा हैं। हमें इससे आगे बढ़ना होगा, जो लोग इस बारे में बात कर रहे हैं, मैं उन्हें अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल की याद दिला दूं. खिलजी ने कई ऐसे बदलाव किये, जिन्हें उलेमा ने शरीयत के खिलाफ बताया था। खिलजी ने कहा था कि हो सकता है कि मैं भले ही अज्ञानी हूं, लेकिन मैं इस देश के हित के मुताबिक फैसले ले रहा हूं। जब ख़ुदा मेरी नादानी के साथ-साथ मेरी नेकनीयत भी देखेगा तो वो मुझे शरीयत के हिसाब से काम न करने के बाद भी माफ़ कर देगा।

संविधान सभा के सदस्यों ने पेश किए तर्क 

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर जब संविधान सभा में बहस चल रही थी तब संविधान के ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन भीम राव आंबेडकर ने कहा कि मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि धर्म कैसे इतनी जगह घेर सकता है कि सारा जीवन ही ढंक ले और विधायी नियमों को धरातल पर उतरने से रोके। आखिर हमें ये आजादी किस लिए मिली है? हमें ये आजादी हमारी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली है। उन्होंने बहस समाप्त करते हुए निष्कर्ष में कहा यूनिफॉर्म सिविल कोड वैकल्पिक व्यवस्था है। ये अपने चरित्र के आधार पर नीति निदेशक सिद्धांत होगा और इसी वजह से राज्य तत्काल यह प्रावधान लागू करने के लिए बाध्य नहीं है। राज्य जब उचित समझें तब इसे लागू कर सकता है। शुरुआती संशोधनों का जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा कि भविष्य में समुदायों की सहमति के आधार पर ही इस प्रावधान पर कानून बनाए जा सकते हैं और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू किया जा सकता है। आंबेडकर का भाषण इस बहस पर आखिरी भाषण था। इसके बाद आर्टिकल 35 का ड्राफ्ट संविधान सभा में वोटिंग के लिए रखा गया। वोटिंग के बाद आर्टिकल 35 को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया और इसकी संख्या बदल कर आर्टिकल 44 कर दी गई।

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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