Actress Suchitra Sen की मौत के वक्त क्यों छुपाया गया चेहरा?

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जब शोहरत का खुमार चढ़ता है तो 7वें आसमान पर होता है लेकिन जब उतरता है तो उन्हें लोगों की निगाहों से इतना दूर ले जाता है कि वो खुद को भी पहचानने से इंकार कर देते हैं। ये बात अपने दौर में सनसनी कही जाने वाली दमदार और बेहद खूबसूरत एक्ट्रेस सुचित्रा सेन पर बिलकुल फिट बैठती है। बंगाली फिल्मों से लेकर बॉलीवुड तक इनका डंका बजता था। अपने उसूलों पर काम करने वाली सुचित्रा सेन को फिल्म में कास्ट करने के लिए सत्यजीत रे और राज कपूर जैसे बड़े डायरेक्टर तरसते थे। इनकी रियल लाइफ में झांके तो ये कहानी किसी फिल्म की तरह नजर आती है। आखिर क्यों उन्होंने खुद को एक कमरे में 36 साल तक कैद रखा और मरते दम तक दुनिया से छिपकर गुमनामी की जिंदगी जी।

साल 1955 डायरेक्टर बिमल राय फिल्म देवदास बना रहे थे। दिलीप कुमार- देवदास और वैजयंती माला चंद्रमुखी के रोल में थी। पारो के किरदार के लिए बिमल राय चेहरा तलाश रहे थे पहले मीना कुमारी को अप्रोच किया गया लेकिन डेट्स की दिक्कत होने से बात नहीं बनी फिर अपनी दूसरी पसंद मधुबाला के पास गए लेकिन उस समय दिलीप कुमार और मधुबाला के रिश्ते ठीक नहीं बेशक वे मुगले आजम की शूटिंग कर रहे थे। ऐसे में पारो का रोल सुचित्रा सेन को दे दिया गया। सुचित्रा सेन की ये पहली हिंदी भाषा की फिल्म थी । इस रोल के लिए उन्हें बेहद पसंद किया और फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता। इस तरह से बॉलीवुड को मिली बेहद खूबसूरत और बेहतरीन एक्ट्रेस सुचित्रा सेन ।

एक इंटरव्यू में दिलीप कुमार ने सुचित्रा सेन की तारीफ करते हुए कहा था कि

‘पहली बार मैंने किसी महिला की खूबसूरती और बुद्धि दोनों एक साथ महसूस कीं। उनकी आंखें कमाल की थीं। उनमें एक अजीब सी नजाकत थी। देवदास के सेट पर पहली दफा उनसे मेरी मुलाकात हुई, तब मैं उन्हें देखता रह गया। उनकी डायलॉग डिलीवरी में एक अलग सी कैफियत थी।’

देवदास से पहले सुचित्रा सेन बंगाली फिल्म इंडस्ट्री की एक जाना माना चेहरा थीं। 06 अप्रैल साल 1931 को सुचित्रा सेन का जन्म पबना नाम की जगह में हुआ था। आज ये जगह बांग्लादेश के सिराजगंज में आती है। पिता हेड मास्टर और मां हाउस फाइफ थी। साल 1947 में 15 साल की उम्र में बिजनेसमैन दीबानाथ सेन से शादी हो गई एक साल बाद बेटी मुनमुन सेन उनके जीवन में आ गई। जो बाद में एक कामयाब एक्ट्रेस बनी। मुनमुन सेन की बेटियां राइमा और रिया सेन भी अपनी मां और नानी की तरह एक्ट्रेस बनी।

सुचित्रा सेन का असली नाम रोमा दासगुप्ता है। बचपन से ही एक्टिंग का शौक था लेकिन ये सपना शादी के बाद सच हो पाया। पति ने मदद की तो साल 1952 में ‘Shesh Kothaay’ बंगाली फिल्म मिली लेकिन बदकिस्मती से ये रिलीज नहीं हो पाई। अगले साल 1953 के फरवरी में दो फिल्में आई। पहली फिल्म थी ‘Saat Number Kayedi’ जो बंगाली इंडस्ट्री में इनकी डेब्यू फिल्म है। दूसरी थी ‘Sharey Chuattor’ जिसमें इसके साथ बांग्ला फिल्मों के पहले सुपरस्टार उत्तम कुमार थे। उत्तम कुमार और सुचित्रा की जोड़ी को खूब पसंद किया गया। इसी वजह से सुचित्रा ने अपने करियर में 61 में से 30 फिल्में उत्तम कुमार के साथ कीं। उनकी रोमांटिक जोड़ी लगभग दो दशक तक चली। सिल्वर स्क्रीन पर कोई रोमांटिक जोड़ी शायद ही इतनी लंबी चली हो।

साल 1960 में अशोक कुमार के साथ फिल्म ‘हॉस्पिटल’ और देवानंद के साथ ‘बंबई का राजा’ फिल्में करने के बाद सुचित्रा कामयाबी और शौहरत का लुत्फ उठा रही थीं, लेकिन इसका असर उनकी शादीशुदा जिंदगी पर पड़ने लगा। अनबन बढ़ी तो पति दिबानाथ उन्हें छोड़कर अमेरिका चले गए। साल 1970 में दिबानाथ का निधन हो गया।

उस दौर में जहां हर कलाकार राज कपूर के साथ काम करना चाहता था। सुचित्रा ने इनकी फिल्म ठुकराई। कई बार बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स भी मना किए। वजह थी अपनी शर्तों में काम करना और इनकी स्वाभिमानी पर्सेनालटी।

सुचित्रा सेन ने अपने 26 साल के करियर में 61 फिल्में ही की। इसमें सिर्फ 6 हिंदी और 55 बांग्ला की फिल्मी है। वहीं 25 से ज्यादा फिल्मों को रिजेक्ट किया है।

सुचित्रा रोल की गंभीरता को बहुत जल्दी भांप लेती थीं और फिल्में चुनने में भी सटीक फैसला लेती थीं। यही वजह है कि साल 1975 में रिलीज हुई इंदिरा गांधी पर बेस्ड फिल्म 'आंधी' जिसमें वे एक्टर संजीव कुमार के साथ नजर आई और आरती देवी के किरदार को जीवंत बना दिया। आज भी लोग सुचित्रा को इसी फिल्म के लिए याद करते हैं। जब ये फिल्म इंदिरा गांधी के शासन में बैन कर दी गई तो समीक्षकों ने कहा था कि ‘सुचित्रा ने अपने अभिनय से इंदिरा गांधी को डरा दिया है।’

सुचित्रा पहली इंडियन एक्ट्रेस थीं जिन्हें किसी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट हीरोइन का अवार्ड मिला हो।

सुचित्रा ने अपने हुनर से तो खूब नाम कमाया लेकिन साल 1978 में रिलीज हुई बंगाली फिल्म ‘Pranay Pasha’ फ्लॉप होते ही इंडस्ट्री छोड़ दी। खुद को 36 सालों तक कमरे में बंद रखा और मरते दम तक दुनिया से छिपकर गुमनामी में जिंदगी जी। उनका परिवार भी उनसे नहीं मिल सकता था। सुचित्रा ने अध्यात्म की राह पकड़ ली। खुद को ऐसा नजरबंद किया कि जब साल 2005 में उन्हें दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड मिला तो वो इसे लेने तक नहीं पहुंची। कहा अवार्ड देना हो तो घर आओ।

सुचित्रा को लंग इन्फेक्शन के चलते लोगों से छिपाकर अस्पताल में भर्ती किया गया । जहां 17 जनवरी साल 2014 इन्होंने 82 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। अंतिम संस्कार के दिन सुचित्रा को देखने के लिए लाखों में भीड़ जमा थी, लेकिन यहां भी उनके चेहरे को ढक दिया।  

उनके नजदीकी सहयोगी गोपाल कृष्ण राय और उन पर किताब लिख चुके है वे कहते है कि, सुचित्रा जब घर से निकलती थीं तो उनका तीन चौथाई चेहरा ढका होता था। आंखों पर काला चश्मा होता था। सुचित्रा को कौन सी चीज लोगों से दूर ले गई शायद उनकी निजी जिंदगी की उथल-पुथल रही होगी। पति बुरी तरह शराब और जुआ के आदी थे। सुचित्रा से उनकी दूरी बन गई थी।

सुचित्रा चाहती थीं कि दुनिया उन्हें उसी तरह याद रखे, जैसा वो खुद को फिल्मों में दिखाती थीं। ठीक हॉलीवुड की ग्रेटा गार्बो की तरह। गार्बो ने भी इसी तरह चमक-दमक के बीच फिल्मी ग्लैमर को अलविदा कह दिया था।

जाते-जाते उन्हीं पर फिल्माया गया म्यूजिक डायरेक्टर रोशन की धुन में सजा और मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा साल 1966 में रिलीज हुई ममता फिल्म का गीत याद आता है।

मौसम कोई हो इस चमन में, रंग बनके रहेंगे इन फिजा में

चाहत की खुशबू, यूं ही जुल्फों से उड़ेगी, खिजायों या बहारें

यूं ही झूमते, यूं ही झूमते और खिलते रहेंगे,

बन के कली बन के सबा बागे वफा में

रहें ना रहें हम, महका करेंगे

बन के कली, बन के सबा, बागे वफा में ...

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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