महिला आरक्षण बिल का सफरनामा

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महिला आरक्षण बिल पर बीआरएस नेता और तेलगांना मुख्यमंत्री की बेटी कविता ने एक दिन धरना दिया। जिसमें उन्होंने 18 पार्टीज के साथ होने का दावा भी किया। बीआरएस नेता कविता ने विमेंस रिजर्वेशन बिल पर कापी बात की । वैसे ये महिला आरक्षण बिल क्या है और ये क्यों जरुरी है।

12 सितम्बर साल 1996 को पहली बार महिला आरक्षण बिल वजूद में आया था, एचडी देवगौड़ा ने इसी तारीख को संसद में सामने रखा था। जिसमें लोकसभा और विधानसभाओं में विमेंस को 33 परसेंट आरक्षण देने की बात की गई थी। इस प्रस्ताव को 26 साल हो चुके हैं और 105 संशोधन भी हो चुके है। लेकिन महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को मुक्कमल नहीं कराया जा सका है। वर्तमान समय में देखे तो महिलाओं की भागीदारी लोकसभा में 79 और राज्यसभा में 24 सीट्स पर है। जो 33 प्रतिशत से कम है। अब पहले जान लेते हैं, ये महिला आरक्षण विधेयक क्या है।

तो महिला आरक्षण विधेयक में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% सीटें आरक्षित करता है। आरक्षित सीटों को राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रीय आधार पर आवंटित किया जा सकता है। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 वर्ष बाद महिलाओं के लिये सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।

 

ऐसा नहीं है कि इस पर कभी बात नहीं बनी, 12 सितंबर 1996 को देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने इसे पहली बार संसद में पेश किया। लेकिन 11वीं लोकसभा भंग होने की वजह से बिल अटक गया। फिर संयुक्त मोर्चा सरकार के पीएम इंद्रकुमार गुजराल ने 17 मई 1997 में एक बार फिर महिला आरक्षण बिल को संसद की पटल पर प्रस्तुत किया, लेकिन तब जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष शरद यादव ने पीएम को बोलने नहीं दिया था।

 

फिर 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की 84वें संविधान संशोधन में इसे पेश किया, फिर 12 वीं लोकसभा भंग हुई और एक बार फिर बिल अटक गया। फिर 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी ने तीसरी बार इसे पेश किया.....लेकिन आम राय न होने की वजह से बिल पास नहीं हो सका। फिर 2003, 2008 और 2009 में भी बिल पर बहस हुई....लेकिन रिजल्ट नहीं निकला। धीरे-धीरे इस बिल पर जोर कम हुआ।

 

नेताओं के मेटिफेस्टो में तो इसका जिक्र रहा लेकिन असलियत में ये पास नहीं हो सका। बीआरएस नेता कविता ने हाल ही में बीजेपी से अनुरोध किया कि 2014 और 2019 के मेनिफेस्टो में पार्टी ने इसे शामिल किया था, लेकिन बहुमत की सरकार के बाद भी 2014 से इस पर कोई बात नहीं हुई है। लोकसभा के दो सत्र बाकी है, इसलिए बीजेपी ये ऐतिहासिक बिल पास कराए।

 

साल 1975 में कमिटी फॉर द स्टेटस ऑफ विमेन ने इस पर चिंता जाहिर की। इसी साल जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, तब 'टूवर्ड्स इक्वैलिटी' नाम की रिपोर्ट में हर क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति का विवरण और आरक्षण पर भी बात की गई थी। रिपोर्ट तैयार करने वाली कमेटी में अधिकतर सदस्य आरक्षण के ख़िलाफ़ थे साथ ही महिलाएं भी चाहती थीं कि वो आरक्षण के रास्ते से नहीं बल्कि अपने बलबूते पर राजनीति में आएं।

 

क्योंकि फ्रीडम के लिए हो रहे आंदोलनों में महिलाएं बढ़-चढकर हिस्सा ले रही थी। वो पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं थी। राजनीति में महिलाओं के वर्चस्वों पर किसी को संदेह नहीं था। सरोजिनी नायडू को भी लगता था कि महिलाओं को आरक्षण दिया जाना या उन्हें मनोनीत कर किसी भी पद पर बैठाना एक किस्म का अपमान है। यानी औरतें इतनी काबिल हैं कि वे अपने काम के आधार पर किसी भी पद पर पहुंच सकती हैं। लेकिन जब पहली लोकसभा का गठन 1952 में हुआ तो उसमें सिर्फ 24 महिला सांसद ही थी। फिर हर लोकसभा में ये गिनती कम ही होती रही।

जिसके बाद 10-15 सालों में ये रवैया बदला और महिलाओं ने अनुभव किया कि राजनीति में हर क़दम पर उनके रास्ते में रोड़े अटकाए जाते हैं और उनके लिए समान मौक़े भी नहीं हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए विधेयक पारित करने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य की विधानसभाओं ने इसका विरोध किया था. उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी।

हालांकि 2010 में राज्यसभा में यह विधेयक पारित हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने काफी हंगामे के बाद इसे राज्यसभा में पारित कराया। उस दिन पहली दफ़ा मार्शल्स का इस्तेमाल हुआ, जिसका इस्तेमाल पहले की सरकारें भी कर सकती थीं लेकिन उन्होंने नहीं किया था। उस दिन अच्छी खासी चर्चा हुई और यह विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया।

लेकिन यूपीए सरकार इस विधेयक को तुरंत ही लोकसभा में लेकर गई। सरकार को उस समय उम्मीद थी कि जिस तरह इसे राज्यसभा में पास करा लिया गया वैसे ही इसे लोकसभा में भी पारित करा लिया जाएगा। लेकिन 2014 में 15वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही यह विधेयक भी ख़त्म हो गया था।

इसलिए अब लोकसभा में महिला आरक्षण के विधेयक को नए सिरे से पेश करना होगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि केंद्र सरकार बहुमत की सरकार है और वो महिला आरक्षण बिल लेकर आए, कांग्रेस का उसे पूरी समर्थन होगा। इसके साथ ही कांग्रेस 1993 में पंचायतों में महिला आरक्षण लागू कर चुकी है, जो पंचायतो में सफलतापूर्वक चल भी रही है।

इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में दुनिया के 193 देशों में भारत का स्थान 148वां है और ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 की मानें तो राजनीतिक सशक्तीकरण सूचकांक में भारत के प्रदर्शन में गिरावट आई है। साथ ही महिला मंत्रियों की संख्या वर्ष 2019 के 23.1% से घटकर वर्ष 2021 में 9.1% तक पहुँच गई है।

इस बिल के पास होने से महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, मेल-फीमेल में इक्वॉलिटी बढ़ेगी और महिला अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल कर पाएगी। ऐसा माना जा रहा है। इस वजह से बिल पास किए जाने पर जोर दिया जा रहा है।