आपने इंसानों को बीमार तो देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान भी बीमार होते हैं ?

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क्या आपको पता है कि पुरी में भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए हैं? सुन कर अजीब लगा न कि भगवान कैसे बीमार हो सकते है,लेकिन ये सही बात है जून में एक खास वक्त में भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद उनका इलाज भी किया जाता है वो भी आयुर्वेदिक पद्धति से । दरअसल जल्द ही पुरी की प्रसिद्ध रथयात्रा होने वाली है। इससे पहले भगवान बीमार पड़े हैं,लेकिन भगवान के बीमार होने का भी एक कारण है। क्या है पूरी कहानी आईये जानते हैं।

शास्त्रों की मानें तो ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि के भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और सुभद्रा जी को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है, जिसे सहस्त्रधारा स्नान नाम दिया गया है। मान्यता है कि ठंडे पानी से स्नान के बाद जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी बीमार हो जाते हैं, और फिर उन्हें 15 दिनों के लिए एकांतवास में रखा जाता है और इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। शास्त्रानुसार भगवान जगन्नाथ के बीमार होने को उनकी 'ज्वरलीला' कहा जाता है। इस दौरान केवल उनके सेवक जिन्हें 'दयितगण' कहा जाता है, वो ही उनके एकांतवास में प्रवेश कर सकते हैं। 15 दिनों की इस अवधि को 'अनवसर' कहा जाता है। 15 दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। कभी भी जगन्नाथ भगवान की रसोई बंद नहीं होती, पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बंद कर दी जाती है। 'अनवसर' के इस काल में भगवान जगन्नाथ को स्वास्थ्य लाभ के लिए जड़ी-बूटी, खिचड़ी, दलिया एवं फलों के रस का भोग लगाया जाता है। अनवसर काल के बाद भगवान जगन्नाथ पूरी तरह से ठीक होकर अपने भक्तों से मिलने के लिए रथ पर सवार होकर निकलते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध 'रथयात्रा' कहा जाता है। हर साल ये 'रथयात्रा' आषाढ़ शुक्ल पक्ष की तिथि को निकाली जाती है। इस बार जगन्नाथ रथ यात्रा 20 जून को है।

 

जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 12वीं सदी से होती है। इसका विस्तृत विवरण हिंदू पवित्र ग्रंथों जैसे पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की ये परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। जैसे ही भगवान जगन्नाथ स्वस्थ हो जाते हैं। उस दिन, भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ अपनी मौसी के घर से होते हुए गुंडिचा मंदिर गए थे। ये दिन अब हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा के साथ मनाया जाता है। पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं।

 

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