Zulfikar Ali Bhutto : जब तानाशाही शासन के शिकार एक प्रधानमंत्री को दी गई फांसी

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Zulfikar Ali Bhutto : जब तानाशाही शासन के शिकार एक प्रधानमंत्री को दी गई फांसी

चार अप्रैल साल 1979, भोर होने में अभी 2:30 घंटे का वक्त था। जगह थी पाकिस्तान का रावलपिंडी सेंट्रल जेल। जेल अफसर एक व्यक्ति को जगाते हैं जिसे एक 07 बाई 10 फीट की कोठरी में कैद किया गया था। वो सफेद रंग का कुर्ता पायजामा पहने हुए थे। जेल अफसरों ने इस बात पर जोर नहीं दिया कि वे इसे बदलें। इसके बाद जबरदस्ती उसके हाथ बांध कर फांसी के तख्त तक ले जाया गया। जल्लाद ने उनका चेहरा काले रंग के कपड़े से ढका और पैर बांध दिए। जैसे ही घड़ी की सुइयों ने 02 बजकर 04 मिनट का वक्त बताया। मजिस्ट्रेट के इशारे पर जल्लाद ने लीवर खींचा। चार अप्रैल की सुबह इस फांसी की खबर पूरी दुनिया में आग की तरह फैल गई। क्योंकि जिसे फांसी पर लटकाया गया वो कोई और नहीं पाकिस्तान के 9वें प्रधानमंत्री रहे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो थे। आमतौर पर फांसी सुबह के वक्त दी जाती है। आखिर क्या वजह थी रातों रात एक प्रधानमंत्री को फांसी पर लटका दिया गया।

किसी भी देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का ओहदा सबसे बड़ा होता है। फांसी तो दूर उन पर कोई भी इल्जाम लगाने से पहले आदमी सौ बार सोचता है। लेकिन 20 दिसंबर 1971 से 13 अगस्त 1973 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति और 14 अगस्त 1973 से 05 जुलाई 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया था।

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की लाइफ पर किताब लिखने वाले सलमान तासीर, जिनकी बाद में हत्या कर दी गई थी। वे अपनी किताब 'भुट्टो - ए पोलिटिकल बायोग्राफी' में लिखते हैं कि, साल 1977, ये वो वक्त था कि जब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को पाकिस्तान के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक माना जाता था, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक ने तख्ता पलट कर ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के कारण थे। भुट्टो के चुनाव के विरोध में पाकिस्तान की सड़कों पर प्रदर्शन हुए और इसमें एक विपक्षी नेता की हत्या कर दी गई थी और हत्या का संगीन आरोप भुट्टो पर लगाया गया था। लेकिन भुट्टो कई बार इन आरोपों को नकारते रहे ।

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बेटी बेनज़ीर भुट्टो अपनी आत्मकथा 'डॉटर ऑफ द ईस्ट' में लिखतीं हैं कि

‘गिरफ्तारी वाली रात मेरी मां चीखते हुए मेरे कमरे में आईं, जागो..., जल्दी जागो...। मेरी मां ने बहन को जगाने के लिए कहा। फौज ने हमारे घर पर कब्जा कर लिया था। हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि हुआ क्या है। सभी फोन के कनेक्शन कट गए थे। फौज हमारे घर से पिता को पीटते हुए बाहर ले गई।’

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के खिलाफ हत्या का मुकदमा लोअर कोर्ट में नहीं सीधे लाहौर हाईकोर्ट में शुरू हुआ। 18 मार्च, साल 1978 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील भी की, लेकिन ये अपील ठुकरा दी गई।

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने अपनी जिंदगी के आखिरी समय रावलपिंडी जेल में गुजारे। वे जब जेल में बंद थे, उस समय जेल में खुफिया अफसर रहे कर्नल रफीउद्दीन ने किताब 'भुट्टो के आखिरी 323 दिन' लिखी है।

वे अपनी किताब में लिखते हैं कि ‘ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का शव करीब आधे घंटे तक फांसी पर लटकता रहा। डॉक्टरी जांच के बाद जब उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। उसके बाद उनकी बेटी बेनज़ीर अली भुट्टो और पत्नी नुसरत भुट्टो की गैरमौजूदगी में ही इनके शव को दफन कर दिया गया।’

कई देशों ने भुट्टो के प्रति नरमी बरतने के लिए जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक से अपील की। लेकिन जिया ने दया नहीं दिखाई। ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने अपने बचाव में कोर्ट में कहा था कि

‘मुझे अपनी पैरवी खुद को बेकसूर साबित करने के लिए नहीं करनी है। मैं ये बात गहराई से सोचने के लिए सामने लाना चाहता हूं। ये मुकदमा एक भोड़ी बदशक्ल नाइंसाफी का उदाहरण है। हर कोई जो हाड़-मांस का पुतला है, उसे एक दिन जरूर दुनिया से जाना है। मैं जीने के लिए जिंदगी नहीं चाह रहा हूं। मैं इंसाफ मांग रहा हूं।’

उनकी मौत के 39 साल बाद 2018 में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की फांसी पर एक बड़ा फैसला आया। सिंध हाईकोर्ट ने भुट्टो को शहीद का दर्जा देते हुए उनके नाम के आगे 'शहीद' जोड़ा। कोर्ट का कहना था, ‘भुट्टो तानाशाही शासन का शिकार हुए थे’।

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की फांसी के 09 साल बाद उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो साल 1988 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं। वे किसी इस्लामी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। 

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के इंडिया में कई समर्थक थे। इंडिया के कई लोगों से उनकी पुरानी दोस्ती थी। भुट्टो की मुंबई में पुश्तैनी प्रॉपर्टी भी थी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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