Actor Amjad Khan : रील में खूंखार विलेन, रियल में नेकदिल

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साल 1915, पाकिस्तान के पेशावर में जकारिया खान का जन्म हुआ। जकारिया खान पढ़ाई करने के बाद एक पुलिस अफसर बने। लेकिन एक्टिंग का शौक उन्हें मुंबई ले आया। नौकरी छोड़ दी और अपना फिल्मी नाम रखा जयंत। साल 1933 में बॉलीवुड में डेब्यू किया। ये सफर चार दशक तक साल 1975 तक चला। इनके तीन बेटे हुए जिसमें से दो बेटे एक्टर बने। एक थे इम्तियाज खान और दूसरे बेटे वो एक्टर थे जिनका हर किरदार यादगार है। इन्होंने कैरेक्टर रोल किये, कॉमेडी की और जब विलेन बने तो अपनी खूंखार हंसी से हर किसी का दिल दहला दिया।

आज कहानी एक्टर अमजद खान की। संघर्ष जीतना भी हो हालात जैसे भी हो वो कभी डरे नहीं। चाहे जब पत्नी के डिलीवरी के वक्त अस्पताल का सिर्फ चार सौ रुपये का बिल नहीं दे पाए हों। या फिर जब इनका भयानक एक्सीडेंट हुआ हो जिसके बाद वो कभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए।

12 नवंबर, साल 1940 को मुंबई में एक्टर जयंत के घर अमज़द खान का जन्म। अमज़द जब 11 साल के हुए तो साल 1951 की फिल्म नाज़नीन में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया। शुरुआती पढ़ाई करने के बाद जब कॉलेज गए तो साथ में थियेटर भी ज्वाइन कर लिया। इसी दौरान वो फिल्मों में काम करने के लिया थोड़ी बहुत कोशिश भी करते। दो तीन फिल्मों में बेहद छोटे-मोटे रोल किए जिससे कोई फायदा नहीं हुआ। पर थियेटर करते रहे। इस तरह से उम्र के 33 साल बीत गए।

साल 1973, डायरेक्टर चेतन आनंद की फिल्म हिन्दुस्तान की कसम रिलीज हुई। जिसमें अमजद को एक छोटा सा रोल मिला। रोल ऐसा था कि सभी ने इसको नोटिस किया।

लेकिन इससे पहले अमजद खान निजी जिंदगी में भी किसी और के नोटिस में आ चुके थे।

दरअसल पड़ोस में रहने वाली शैला खान को अमजद दिल दे बैठे थे। एक दिन प्रपोज कर दिया। तमाम विरोध के बाद भी दोनों ने साल 1972 में शादी कर ली। अमजद और शैला के तीन बच्चे हुए। अमजद के बड़े बेटे शादाब खान ने साल 1997 में रिलीज हुई फिल्म ‘राजा की आएगी बारात’ से बॉलीवुड डेब्यू किया था।

शादाब खान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब मेरे पैदा होने के वक्त मेरी मां (शैला खान) अस्पताल में भर्ती थीं तब पिता (अमजद खान) के पास अस्पताल का बिल देने के पैसे नहीं थे। मेरे पिता ने अस्पताल जाने से इन्कार कर दिया क्योंकि उन्हें शर्म आ रही थी।’

शादाब खान आगे बताते हैं कि उस वक्त फिल्म 'हिंदुस्तान की कसम' को लेकर पिताजी और फिल्म प्रोड्यूसर चेतन आनंद साथ में काम कर रहे थे। पिताजी परेशान थे। तब चेतन आनंद ने 400 रुपये उधार दिए। जिसके बाद मेरी और मां की अस्पताल से छुट्टी हो पाई।’

इसी बीच दो साल का वक्त और बीत गया। इधर सलीम खान और जावेद अख़्तर की जोड़ी और फिल्म डायरेक्टर रमेश सिप्पी फिल्म शोले के लिए एक ऐसे विलन की तलाश कर रहे थे, जो खूंखार और सर्कास्टिक दोनों लगे। उन्होंने इस रोल के लिए डैनी को चुना। लेकिन डैनी ने फिल्म का ऑफर ठुकरा दिया। एक दिन रमेश सिप्पी थिएटर देखने गए। जब आर्मी यूनिफार्म पहने और दाढ़ी बढ़ाए अमजद खान की एंट्री हुई तो रमेश सिप्पी को पहली ही नजर में अपना गब्बर मिल गया था।

रमेश सिप्पी ने अमजद का ऑडिशन लिया। सब ठीक था पर उन्हें अमजद की आवाज में कमी लगी। उधर सलीम-जावेद अड़ गए की गब्बर का रोल तो अमजद ही करेंगे।

साल 1975 फिल्म शोले रिलीज हुई तो अमिताभ, धर्मेंद्र, संजीव कुमार के होते हुए भी सारी तारीफें अमजद खान बटोर ले गए। गब्बर यानी अमजद खान के सभी डायलॉग लोगों की जुबान पर थे। अमजद खान इंडस्ट्री के टॉप पर आ गए। फिर साल दर साल एक से बढ़कर एक फिल्मों के जरिये वो लोगों के दिलों में छा गए। अपने किरदारों से कभी डराया, कभी गुदगुदाया कभी रोने पर भी मजबूर किया।

एक मैगजीन में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अली पीटर जॉन लिखते हैं कि अमजद खान नेकदिल इंसान थे। उनके इंडस्ट्री में कई सारे दोस्त थे। लेकिन सबसे खास दोस्तों में अमिताभ बच्चन थे। अमिताभ के साथ दर्जनों फिल्में कीं। कभी दोनों हीरो और विलन बने। कभी दोस्त। कभी पिता-पुत्र।

अमजद खान ने कमर्शियल फिल्मों के साथ ही पैरलल सिनेमा में भी काम किया। साल 1977 में रिलीज हुई सत्यजीत रे की फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में उनकी एक्टिंग को सराहा गया। 

इधर पत्नी और तीन बच्चों के होने के बाद अमजद का दिल एक्ट्रेस कल्पना अय्यर पर आ गया। दोनों शादी करना चाहते थे। पर अमजद को वक्त रहते समझ आ गया कि इस तरह से उनका घर टूट जाएगा। शादी का इरादा बदल दिया। पर वो हमेशा कल्पना को गाइड करते रहे।

अमजद खान का आखिरी वक्त में बेहद दुख भरा था।दरअसल साल 1976 में वो फिल्म ‘द ग्रेट गैंबलर’ की शूटिंग के लिए मुंबई से गोवा कार से जा रहे थे। रास्ते में उनका भयानक एक्सीडेंट हो गया। उनकी कई पसलियां टूट गई। वो बच तो गए लेकिन इस दौरान उन्हें जो दवाइयां दी गईं, उनसे उनका वजन लगातार बढ़ता गया, जिसकी वजह से कई तरह के हेल्थ कॉम्प्लिकेशन्स हुए। मोटे होने की वजह से प्लेन में दो सीट बुक कराई जाती। एक मंजिल जीना उतरने-चढ़ने में एक-एक घंटे लग जाते। लोग इनका मजाक बनाते। लेकिन अमजद खान जो खुद कहते थे कि ‘जो डर गया, समझो वो मर गया’ इसलिए वो कभी अपने हालत से डरे नहीं।

26 जुलाई साल 1992 को जब रात में सोए तो 27 जुलाई की सुबह अपने बिस्तर से उठे ही नहीं। मात्र सिर्फ 51 साल की उम्र में नींद में ही दिल का दौरा पड़ा और ये नायाब सितारा हमेशा के लिए दूर चला गया। उनके निधन के बाद साल 1996 तक उनकी करीब 10 से ज्यादा फिल्में रिलीज हुईं।

बॉलीवुड के इतिहास में न जाने कितने ही बेहतरीन कलाकार है। अमजद खान भी ऐसे ही नगीने हैं। इनका नाम इंडस्ट्री में इस तरह से लिखा है जिसे चाह कर भी कभी खरोंचा नहीं जा सकता।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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