Actor Naseeruddin Shah : 'बॉलीवुड के शाह' की कहानी

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साल 1857, देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ। अंग्रेज तिलमिला गए। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के रहने वाले आगा सैय्यद मुहम्मद शाह जो एक फौजी थे, वो ब्रिटिश फौज में शामिल होकर इस संग्राम के खिलाफ लड़े। उनकी काबिलियत से खुश होकर अंग्रेजों ने मेरठ की सरधना जागीर दी। इनके बेटे के बेटे अली मोहम्मद शाह भी ब्रिटिश गवर्नमेंट में नौकरी करते।

आजादी मिली अंग्रेज चले गए, पर बंटवारे का दंश दे गए। लाखों मुसलमान पाकिस्तान चले गए। लेकिन जो मुसलमान भारत में ही रुके उनमें से एक अली मोहम्मद शाह भी थे। इनके तीन बेटे हुए। जिसमें से एक बॉलीवुड के शानदार एक्टर बने।

वो एक्टर जिन्होंने पैरलल सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा में अलग पहचान बनाई। इनके चाहने वाले पूरी दुनिया में हैं। फिल्मों में हर तरह के किरदार निभाये। लेकिन निजी जीवन का किरदार भी उन्हें अक्सर सुर्खियों में ला देता है। सामाजिक मुद्दों पर बेबाक बोल देते है। फिल्मफेयर के अवॉर्ड्स को बाथरूम के दरवाजों का हैंडल बना दिया।

आज कहानी एक्टर नसीरुद्दीन शाह की। जिन्होंने 20 साल की उम्र में 15 साल बड़ी और 32 साल की उम्र में अपने से 13 साल छोटी लड़की से शादी की। ये एक अजीब सी बीमारी से भी पीड़ित है।

यूपी के बाराबंकी में अली मोहम्मद शाह अपनी पत्नी फारुख सुल्तान के साथ रहते। इन्हीं के घर 20 जुलाई साल 1950 को नसीरुद्दीन शाह का जन्म हुआ। पिता सरकारी नौकरी की वजह से देश के कई जगहों में रहे। इसलिए नसीर की शुरुआती पढ़ाई अजमेर और नैनीताल से हुई। ग्रेजुएशन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से किया।  

इसी यूनिवर्सिटी में इनकी मुलाकात परवीन मुराद से हुई। जो एक पाकिस्तानी थीं।

एजुकेशन वीजा पर भारत में रह रहीं थी। दोनों की मुलाकात हुई। और उम्र में 15 साल बड़ी परवीन को नसीर दिल दे बैठे।

नसीर अपनी बायोग्राफी ‘And Then One Day’ में लिखते हैं कि उन दिनों पाकिस्तान और भारत में तनाव था। भारत दौरे पर आए हुए पाकिस्तानियों को पंजीकरण कराना पड़ता था। पुलिस स्टेशन में हफ्ते में रिपोर्ट देनी पड़ती थी। परवीन का वीजा खत्म हो गया तो एक नोटिस जारी हुआ। उनको भारत में ही रहना था। ये मुमकिन तब था जब वो किसी भारतीय से शादी कर लें। परवीन को भारत में रोकने के लिए हम दोनों ने शादी कर ली।

दोनों की एक बेटी हीबा शाह हुई। पर ये शादी ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं। हिबा को लेकर परवीन लंदन शिफ्ट हो गईं।

नसीर को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पहली मोहब्बत तो मिली ही थी उनको एक्टिंग का शौक भी यहीं पर लगा। वो प्लेज़ करते। पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ लिखकर डॉक्टर बने। पर नसीर को एक्टिंग में जाना था।

साल 1971 में National School Of Drama दिल्ली में एडमिशन ले लिया। जहां उनकी मुलाकात एक्टर ओम पुरी से हुई। दोनों में दोस्ती हुई जो ताउम्र रही।

साल 1974 में नसीर Film And Television Institute पुणे चले गए। यहां पर उनकी मुलाकात एक्ट्रेस रत्ना पाठक से हुई।

इस मुलाकात के बारे में एक्ट्रेस रत्ना पाठक ने एक इंटरव्यू में बताया था कि, सत्यदेव दुबे के डायरेक्शन में हो रहे एक नाटक में हम दोनों थे। प्ले के रिहर्सल में हम मिले। ये पहली नजर का प्यार तो नहीं था, पर दोस्त बने। हम अक्सर साथ घूमते थे।

नसीर अपनी किताब - ‘And Then One Day’ में लिखते हैं कि मैंने जब अम्मी से बताया कि, मैं एक हिंदू लड़की से शादी करना चाहता हूं। उन्होंने पूछा तुमने क्या उसको इस्लाम कबूल करने को कहा है? मैंने अम्मी से कहा कि, नहीं मैं रत्ना को इस्लाम कबूल करने को बिल्कुल नहीं कहूंगा।’

रत्ना नसीर से 13 साल छोटी थीं। ये मोहब्बत सात साल चली और साल 1982 में दोनों ने शादी कर ली। उनके दो बेटे हुए विवान और इमाद शाह है। इधर पहली पत्नी परवीन का निधन हो गया तो बेटी हीबा शाह की परवरिश रत्ना पाठक ने ही की।

लेकिन इन सबसे पहले ही नसीर एक बड़े एक्टर बन चुके थे।

ग्रेट डायरेक्टर श्याम बेनेगल को नसीर में एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया तो साल 1975 की फिल्म 'निशांत' में एक रोल दिया।

चार साल बाद साल 1979 में डायरेक्टर साई परांजपे की फिल्म 'स्पर्श' में लीड रोल मिला। फिल्म में एक ब्लाइंड पर्सन का ऐसा किरदार निभाया कि इन्हें नेशनल अवार्ड मिला।

साल 1980 की फिल्म 'आक्रोश' में वकील, साल 1981 की चक्र में लुक्का और साल 1983 की फैमिली ड्रामा फिल्म मासूम में डीके का किरदार। इन तीनों के लिए  फिल्म फेयर का अवार्ड मिला।

कभी कॉमेडी की तो विलेन बने। किरदार चाहे जो भी हो उसे पूरी शिद्दत से निभाया।

200 से ज्यादा फिल्में कर चुके नसीर ने वेब सीरीज ताजसे ओटीटी में भी कदम रखा है। कई इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स के साथ पाकिस्तानी फिल्मों में भी काम किया।

नसीर अपने विवादित बयानों से भी सुर्खियों में रहते। एक इंटरव्यू में फिल्म फेयर के अवॉर्ड्स के लिए ऐसी बात की सभी दंग रह गए।

वो बताते हैं कि 'कहा जाता है कि, ये साल का बेस्ट एक्टर है। ये कैसे सही है? इसलिए, जब मैंने एक फार्म हाउस बनाया तो अपने सभी अवॉर्ड्स को वहां रखने का फैसला किया। जो भी वॉशरूम जाएगा, उसे दो-दो अवॉर्ड मिलेंगे। क्योंकि हैंडल फिल्मफेयर अवॉर्ड्स के बने हैं।'

एक इंटरव्यू में नसीर ने बताया था कि ‘मैं ओनोमैटोमेनिया नाम की बीमारी से जूझ रहा हूं। मैं चाहकर भी सुकून से नहीं रह पाता।’ ओनोमैटोमेनिया से पीड़ित मरीज को कुछ खास शब्दों से बेहद लगाव होता है। वो बार-बार उसी शब्‍द को बोलते हैं।

पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित नसीर समाज के मुद्दों में बेबाक राय रखते हैं इनकी गिनती उन कलाकारों में होती है जो देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान में यकीन रखते हैं।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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