Actress Devika Rani : हिंदी सिनेमा की फर्स्ट लेडी

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माता-पिता थे रिश्ते में मामा और भांजी

विश्वविख्यात कविसाहित्यकारदार्शनिक और नोबेल अवार्ड से सम्मानित, पहले भारतीय, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के 14 भाई-बहन थे। इनकी एक बहन सुकुमारी देवी जिनकी शादी दुर्गादास चौधरी से हुई उनका एक बेटा हुआ कर्नल डॉ मन्मथनाथ चौधरी। जो विशाखापट्टनम के पास वलतायर के जमींदार थे और मद्रास प्रेसीडेंसी के पहले सर्जन थे। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की एक और बहन सौदामनि देवी थी जिनकी बेटी इंदुमती देवी और इंदुमती देवी की बेटी लीला देवी। लीला देवी बेहद पढ़ी-लिखी और जागरूक महिला थीं। रिश्ते में मामा और भांजी लगे डॉ मन्मथनाथ चौधरी और लीला देवी ने शादी की। इन्ही के घर 30 मार्चसाल 1908 को एक बेटी का जन्म हुआ – नाम रखा देविका रानी।

खूबसूरत, बेबाक और बिंदास

वो जिन्होंने समाज के खिलाफ जाकर हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाई और पहली महिला सुपरस्टार का दर्जा पाया। हिंदी सिनेमा की फर्स्ट लेडी और ड्रैगन लेडी भी कहा गया। एक फिल्म में किसिंग सीन की वजह से सुर्खियों के साथ विवादों में आईं। पर परवाह नहीं कि क्योंकि इनका अंदाज बेबाक था। बोल्ड इतनी कि खुलेआम शराब और सिगरेट पिया करतीं। खूबसूरत का आलम ये, एक बार जिसने देखा वो देखता रह गया।

'पद्मश्री' और 'दादा साहेब फाल्के' का सम्मान पाया

लंदन से पढ़ाई। वहीं एक फिल्म प्रोड्यूसर से शादी की। भारत में अपने दौर का सबसे बड़ा प्रोडक्शन हाउस खोला। अशोक कुमारदिलीप कुमार और मधुबाला जैसे कलाकार को पहला मौका दिया। पति से रिश्तों में तल्खी आई तो को स्टार से दिल लगाया। पर उससे धोखा मिला तो फिर सब कुछ छोड़ दूसरी शादी कर अगले 49 साल आम सी जिंदगी जी। आज कहानी साल 1958 में 'पद्मश्री' और साल 1969 में इंडियन सिनेमा के सबसे बड़े अवार्ड 'दादा साहेब फाल्के' पाने वाली पहली भारतीय देविका रानी की। हमेशा अपनी ही शर्तों में जिंदगी जी। आखिरी वक्त करोड़ों की जायदाद,  आलीशान घर। पर पास में तन्हाई के अलावा और कोई नहीं।

इंग्लैंड के बोर्डिंग स्कूल से की पढ़ाई

साल 1917देविका रानी जब नौ साल की हुईं तो माता-पिता ने इंग्लैंड के बोर्डिंग स्कूल भेजा। पढ़ाई पूरी कीफिर लंदन के 'रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट' से सेट डिजाइनिंग और कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग जैसे कोर्स किए और साल 1927 आते-आते लंदन में ही टेक्सटाइल डिजाइनिंग की जॉब करने लगीं। पर किस्मत ने कुछ और तय किया था।

लंदन में देविका रानी की मुलाकात होती है हिमांशु राय से।

एक बंगाली फैमिली से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु राय शांतिनिकेतन से पढ़े थे। कोलकाता यूनिवर्सिटी से लॉ किया फिर बैरिस्टर बनने लंदन आ गए। पर यहां वो नाटककार और पटकथा लेखक निरंजन पाल से मिले तो फिल्में बनाने लगे। साल 1922 की फिल्म 'द लाइट ऑफ एशिया' का डायरेक्शन किया और हीरो बने। ये साल 1928 थाजब हिमांशु राय लंदन में फिल्म 'द थ्रो ऑफ़ डाइस' की शूटिंग कर रहे थे। वो जब देविका रानी से मिले तो प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए। उन्होंने देविका रानी को अपने प्रोडक्शन हाउस में कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग और आर्ट डायरेक्शन करने का ऑफर दिया। हिमांशु राय और देविका रानी साथ काम करने के दौरान प्यार में पड़े। उम्र में 16 साल का फासला था। 21 साल की देविका रानी और 37 साल के हिमांशु राय ने साल 1929 में शादी कर ली और बर्लिन में रहने लगे।

जब एक किसिंग सीन से मचा बवाल

ये वो दौर था जब भारत में भी अच्छे स्केल में फिल्में बनना शुरू हुईं हो गई थी। तो हिमांशु राय और देविका रानी भारत आए और 'बॉम्बे टॉकीज' की नींव रखी। ये उस दौर में सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो हुआ करता था। हिमांशु रायखुद हीरो बनते और अपनी बेहद खूबसूरत पत्नी देविका रानी को हीरोइन लेते। तब भारत में फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। फिर भी समाज के खिलाफ जाकर देविका रानी ने साल 1933 की फिल्म 'कर्मा' से बतौर एक्ट्रेस करियर शुरू किया और रातोंरात स्टार बनीं। वो खूब सुर्खियों में रहीं, वजह थी। फिल्म में देविका रानी और हिमांशु राय के बीच फिल्माया गया 4 मिनट का एक किसिंग सीन था - जिससे विवाद हुआ। पर देविका रानी का अंदाज बेबाक था। उन्होंने किसी बात की फिक्र नहीं की।

हिमांशु राय और देविका रानी के रिश्ते के बीच आई तल्खी

सब ठीक चल रहा था – पर अब देविका रानी के जीवन में उथल-पुथल मचने वाली थी। वजह थी की देविका रानी को भनक लगी कि हिमांशु राय ने साल 1924 में मेरी हेनलिन नाम की लड़की से शादी की है। एक बेटी नीलिमा डिट्ज़ भी है। बेशक साल 1926 में दोनों का तलाक हो गया था पर देविका रानी को इस बात से धक्का लगा।

साल 1935 की फिल्म 'जवानी की हवा' बन रही थी। देविका रानी तो हीरोइन बनीं। पर हीरो हिमांशु राय नहीं नया चेहरा बना - नज्म-उल-हसन। लखनऊ के नज्म-उल-हसन में हर वो बात कि कोई भी लड़की फिदा हो जाए। शूटिंग के दौरान टूटा दिल लिए देविका रानी भी उनके प्यार में पड़ी। फिल्म 'जवानी की हवा' सुपरहिट हुई तो हिमांशु राय ने देविका रानी और नज्म-उल-हसन को लेकर एक और फिल्म 'जीवन नैय्या' की अनाउंसमेंट कर दी। शूटिंग शुरू पर देविका रानी और नज्म-उल-हसन नहीं आए। हिमांशु राय को खबर लगी कि देविका रानी और नज्म-उल-हसन कोलकाता भाग गए। हिमांशु राय ने कहा - वापस आ जाओ पर देविका रानी ने मना कर दिया। कुछ वक्त बीता देविका रानी को लगा शायद नज्म-उल-हसन भी उन्हें धोखा दे रहे हैं। हिमांशु राय भी उन्हें बार – बार बुला रहे थे। इस वजह से वो दोबारा लौटी पर कुछ शर्तों के साथ। उन्होंने हिमांशु राय से अपने किसी भी काम में दखल न देते की बात कही।

अशोक कुमार के सााथ बनी हिट जोड़ी

देविका रानी जब वापस लौटी तो फिल्म 'जीवन नैय्या' शुरू हुई। हीरोइन देविका रानी और हीरो बने 'कुमुद लाल गांगुली' उर्फ अशोक कुमार। ये अशोक कुमार की पहली फिल्म थी। फिल्म हिट हुई तो देविका रानी और अशोक कुमार की जोड़ी ने साल 1936 की 'अछूत कन्या' और साल 1938 की 'वचन' जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी।

हिमांशु राय के बाद बॉम्बे टॉकीज की जिम्मेदारी देविका रानी के कंधों पर आई

इधर हिमांशु राय और देविका रानी साथ तो रह रहे थे पर पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं था। पारिवारिक कलह के साथ कुछ फिल्में फ्लॉप हुई ये परेशानी हिमांशु राय झेल न सके और साल 1940 में 48 साल की उम्र में हार्ट अटैक आने से उनका निधन हो गया। अब बॉम्बे टॉकीज की जिम्मेदारी देविका रानी के कंधों पर आई उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी संभाला भी। साल 1942 की 'बसंत' से मधुबाला और साल 1944 की फिल्म 'ज्वार भाटा' से दिलीप कुमार जैसे कलाकारों को पहला ब्रेक दिया।

कभी-कभार कोई खैर खबर ले लेता

पर वक्त एक जैसा नहीं रहता। दौर बदला, बॉम्बे टॉकिज की फिल्में फ्लॉप होने लगी। कई दोस्त साथ छोड़कर चले गए। देविका रानी अकेले हुईं तो उन्होंने भी 37 साल की उम्र में सब कुछ छोड़ कर साल 1945 में एक रशियन पेंटर स्वेतोस्लाव रोरिच से शादी कर ली आम सी जिंदगी जीने लगे। देखते-देखते 49 साल, गुमनामी में बीत गए। खूब सारी दौलतबड़ा सा बंगला पर, रहने वाला कोई नहीं। उनकी कोई संतान नहीं थी। कभी-कभार कोई खैर खबर ले लेता। आखिरी वक्त सिर्फ तन्हाई। साल 1993 में पति रोरिच का निधन हो गया और उसके अगले साल 9 मार्च, साल 1994 को देविका रानी भी 85 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गईं। उनके खूबसूरत बंगले को भारत सरकार ने म्यूजियम बना दिया है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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