Captain G. R. Gopinath : पहले बैलगाड़ी, फिर चलाई भारत की सबसे सस्ती एयरलाइन

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देखा एक ख्वाब...

एक कैप्टन ने सपना देखा। हवा में उड़ने की महंगी कीमत को जमीन पर उतारने का। वो सपना जिसमें आम भारतीय नागरिक हवाई जहाज का सस्ता टिकट लेकर आसमान में उड़ सके। सपने को पूरा करने के लिए सब कुछ दांव पर लगाया। सेना की नौकरी छोड़ी, एक दो नहीं दसियों अलग-अलग बिजनेस किए। पैसे की जरूरत पड़ी तो पत्नी के जेवर बेचे। दोस्तों से उधार लिया। सालों का लंबा वक्त लगा पर अपना धैर्य नहीं खोया। जो करना था करके दिखाया।

संघर्ष से भरी इस जिंदगी पर बनी हैं फिल्में

उम्मीदेंभावनाएं और अथाह संघर्ष की इस असल कहानी पर फिल्म भी बनी है। डायरेक्टर सुधा कोंगारा की फिल्म 'सरफिरा'। जिसमें एक्टर अक्षय कुमार ने उन्हीं कैप्टन का किरदार निभाया। जिनका नाम है 'डेक्कन एयरलाइंसकी नींव रखने वाले गोरूर रामास्वामी अयंगर गोपीनाथ की। एक्टर अक्षय कुमार की फिल्म 'सरफिरासे पहले साल 2020 में कैप्टन जीआर गोपीनाथ की ऑटोबायोग्राफी 'सिंपली फ्लाइंगपर बेस्ड तमिल फिल्म 'सोरारई पोटरुभी बनीं है जिसे सुधा कोंगारा ने डायरेक्ट किया है और एक्टर सूर्या ने कैप्टन जीआर गोपीनाथ का किरदार निभाया है। जिन्होंने बैलगाड़ी से हवाई जहाज तक का सफर तय किया। मौजूदा वक्त में इनकी एयरलाइंस तो बंद हो चुकी है जो बड़ी मेहनत से बनाई थी पर वो कहते हैं कि 'मेरा सपना अब भी जीवित है।'

किसान के घर पैदा हुआ सिपाही

तमिल परिवार से ताल्लुक रखने वाले रामास्वामी अयंगरअपनी पत्नी के साथ कर्नाटक के हसन डिस्ट्रिक्ट के गोरूर नाम के एक छोटे से गांव में रहते। इनके 08 बच्चे थे। जिसमें दूसरे नंबर पर थे, 13 नवंबर, साल 1951 को जन्मे 'गोरूर रामास्वामी अयंगर गोपीनाथ'। मां गृहणीपिता एक किसान और शिक्षक। गोपीनाथ की शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई। फिर 5वीं क्लास में पहली बार वो एक कन्नड़ स्कूल पहुंचे। पढ़ाई के साथ-साथ पिताजी का खेती किसानी में हाथ बंटातेबैलगाड़ी चलाते। ऐसा कहा जाता है 'किसान के घर या तो किसान पैदा होता है या फिर सिपाही।गोपीनाथ ने किसानी तो कर ली थीअब बारी थी सिपाही बनने की। साल 1962, कर्नाटक के बीजापुर के 'सैनिक स्कूलमें दाखिला लिया। फिर 'नेशनल डिफेंस एकेडमी' का एग्जाम पास कर 19-20 साल की उम्र में 'इंडियन आर्मी' ज्वाइन की। साल 1971 में पाकिस्तान से जंग में भी हिस्सा लिया। 26-27 साल की उम्र तक कैप्टन भी बन गए।

आर्मी की नौकरी के दौरान खुद को बंधा हुआ पाते

सब ठीक था। पर नौकरी के दौरान वो खुद को बंधा हुआ पाते। उनके मन में हमेशा कुछ नया करने की चाहत रहती। इसलिए 08 साल आर्मी में नौकरी करने के बाद इस्तीफा दे दिया। साल 1979। उम्र 28 साल की थी। सेना छोड़ चुके थे। जिंदगी में पत्नी के रूप में भार्गवी भी दाखिल हो चुकी थीं। कुछ नया करना की चाहत लिए नए प्रयोग शुरू किए। सबसे पहले खेती कीजो कमायाउसे अलग-अलग बिजनेस में लगाया। कैप्टन जीआर गोपीनाथ अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि 'मैंने दूध बेचने के लिए जानवर पालेमुर्गी फार्मिंग और सिल्कवर्म फर्मिंग कीबाइक डीलरस्टॉक ब्रोकर बनाहोटल खोलेसिंचाई से जुड़े सामान बेचेकृषि सलाहकार बनाफिर ये सफर एविएशन एंटरप्रेन्योर तक पहुंचा।'

सालों का लगा लंबा वक्त

पर इतना आसान नहीं था। इस सफर को तय करने में एक-दो नहीं 24 साल गुजर गए। साल 1992 कैप्टन जीआर गोपीनाथ की मुलाकात उनके पुराने दोस्त कैप्टन केजे सैमुअल से हुई जो उन दिनों सेना से रिटायर होकर बतौर फ्रीलांसर पायलट का काम कर रहे थे और एक कमर्शियल हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने पर विचार कर रहे थे। साल 1995 कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने उनके साथ पार्टनरशिप में 'डेक्कन एविएशनकी शुरुआत हुई।

जब एक विचार ने लिया जन्म

कुछ साल बीते। फिर एक आइडिया ने जन्म लिया। सस्ती एयरलाइंस का। अपनी ऑटोबायोग्राफी 'सिंपली फ्लाइंगमें कैप्टन जीआर गोपीनाथ लिखते हैं कि 'साल 2000 में मैं अमेरिका के फीनिक्स गया था। बालकनी में बैठे चाय पी रहा था तभी ऊपर से हवाई जहाज गुजरा। कुछ देर में एक और हवाई जहाज और फिर घंटे भर में चार से पांच हवाई जहाज गुजर गए। ये आश्चर्य से भरा था क्योंकि उन दिनों भारत में हवाई सेवाएं इतनी सुदृढ नहीं थीं। मैंने फीनिक्स एयरपोर्ट के बारे में पता कियावो अमेरिका के टॉप एयरपोर्ट में शामिल भी नहीं था फिर भी वहां से 1,000 उड़ानें चलती थीं। ये हर दिन करीब एक लाख यात्रियों को सेवाएं दे रहा था। उस वक्त भारत के 40 एयरपोर्ट मिलकर भी इतनी उड़ानें नहीं दे पा रहे थे। उस दौर में अमेरिका में एक दिन में 40,000 कमर्शियल उड़ानें चलती जबकि भारत में सिर्फ 420'

जब सपनों का हवाई जहाने ने भरी पहली उड़ान

कैप्टन जीआर गोपीनाथ एक इंटरव्यू में कहते हैं कि 'इस विचार के पीछे मूल भावना ये थी कि हर भारतीय अपनी जिंदगी में एक बार प्लेन में जरूर बैठे।फिर शुरू होती थी 'डेक्कन एयरलाइंसशुरू करने की जद्दोजदह। सबसे मुश्किल काम थापैसों का इंतजाम। पत्नी के जेवर और परिवार के पास जो था वो सब लिया। दोस्तों से मदद मांगी। साल 2003 में 48 सीटों और 02 इंजन वाले 06 फिक्स्ड-विंग टर्बोप्रॉप हवाई जहाजों के बेड़े के साथ 'डेक्कन एयरलाइंसकी नींव रखी और पहली उड़ान भरी गई हुबली से बेंगलुरु तक।

अलग पॉलिसी से 'डेक्कन एयरलाइंस' ऊंचाइयों पर पहुंची

कंपनी ने पॉलिसी अपनाई कि ग्राहकों को आधे दर पर टिकट देंगे। इसमें एक यूनिफार्म इकोनॉमी केबिन क्लास और यात्रा के दौरान खाने-पीने का भुगतान भी शामिल होगा। इसका घाटा एड से पूरा किया जाएगा। कंपनी ने यात्रियों को 24 घंटे कॉल सेंटर की सेवा दी। ताकि कभी भी टिकट बुक कराई जा सके। शुरुआत में 'डेक्कन एयरलाइंससे तो सिर्फ 2,000 लोग हवाई सफर कर रहे थे लेकिन चार साल के अंदर ही यानी 2007 तक हर रोज 25,000 लोग सस्ती कीमतों पर हवाई सफर करने लगे। देश के 67 एयरपोर्ट में एक दिन में कंपनी की 380 फ्लाइट्स उड़ रही थीं और कंपनी के पास 45 जहाज हो चुके थे। ये सब भारत में पहली बार हो रहा था। ये वक्त कैप्टन जीआर गोपीनाथ का था। मैदान खाली था और वो हवा से बातें कर रहे थे।

ये वक्त ज्यादा दिनों कर नहीं रहा

दरअसल कई और कंपनियां भी एविएशन फील्ड में उतर आईं। उन्होंने भी कैप्टन जीआर गोपीनाथ के फॉर्मूले को अपनाया और हवाई यात्राओं को आम लोगों की जेब के हिसाब से सेट किया। दूसरी कंपनियों से टक्कर मिली। धीरे-धीरे घाटा बढ़ा और इससे पहले सब खत्म होता 'डेक्कन एयरलाइंसका सौदा शराब के कारोबारी विजय माल्या की कंपनी 'किंगफिशरसे कर दिया गया। विजय माल्या ने 'डेक्कन एयरलाइंसको नया नाम दिया – 'किंगफिशर रेड'। कैप्टन जीआर गोपीनाथ को भरोसा था कि भले ही वो 'डेक्कन एयरलाइंसके साथ नहीं हैं लेकिन उनका सपना हवाई उड़ान भरता रहेगा। पर अफसोस विजय माल्या उनके सपने को संजो नहीं पाए और कंपनी साल 2013 में बंद हो गई।

फिर भी जिंदगी से हार नहीं मानी

कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने साल 2013 में एयर-कार्गो सर्विस की शुरुआत की जिसका नाम रखा - 'डेक्कन 360'। पर अफसोस ये कंपनी भी बंद हो गई। फिर साल 2009 और 2014 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा पर राजनीति में सफल नहीं हुए। कुछ तो करना था तो मीडिया हाउस से जुड़े लेख लिखने लगे। साल 2017 में अपनी दूसरी किताब 'यू मिस नॉट दिस फ्लाइट: एसेज ऑन इमर्जिंग इंडियाभी लिखी। अब उम्र 73 साल की हो चुकी है। मौजूदा वक्त में वो परिवार के साथ बेंगलुरु में रह रहे हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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