D Voters : जब नाम के आगे लिखा गया ‘डी’

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कैसे शुरू हुई समस्या?

भारत में वोट डालने की न्यूनतम उम्र सीमा 18 साल है। वरिष्ठ नागरिक भी वोट डाल सकते हैं और विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिक भी। ये सभी मिलकर अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करते है। मौजूदा वक्त में भारत में लोकसभा का चुनाव चल रहा है। भारत में मनाए जा रहे लोकतंत्र के इस पर्व में लोग बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। वहीं असम में एक समुदाय ऐसा भी है, जो इस पर्व का हिस्सा नहीं बन सकता यानी ये लोग किसी भी चुनाव में वोट नहीं डाल सकते। सरकार ने इन्हें डी-वोटर्स का दर्जा दिया है। कौन होते हैं ये डी वोटर? क्यों नहीं है चुनाव में वोट डालने का हक और कैसे शुरू हुई ये समस्या?

डी-वोटर्स का मतलब - डाउटफुल वोटर्स

ऐसे लोग जिनकी नागरिकता को लेकर संशय है। सरकार ने ऐसे लोगों की एक श्रेणी बनाई है, जिनके पास नागरिकता लेने के उचित दस्तावेज नहीं हैं। इन डी-वोटर्स का चयन विदेशी अधिनियम के तहत विशेष न्यायाधिकरणों से किया जाता है। एक खबर के मुताबिक फिलहाल इनकी संख्या करीब एक लाख है। असम में एनआरसी और सीएए से जुड़े आंदोलनों में भी डी-वोटर्स एक मुद्दा है। दरअसल, असम राज्य की सीमा बांग्लादेश से लगती है। ऐसे में असम आजादी के वक्त से माइग्रेशन का सामना कर रहा है। बहुत सारे लोग युद्ध और उत्पीड़न से बचकर बांग्लादेश से असम में बिना कागजी कार्यवाही के आ जाते हैं। भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए तय किया है कि जो लोग 24 मार्च साल 1971 यानी बांग्लादेश की आजादी के लिए हुए युद्ध से पहले आए, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। इस तारीख के बाद आने वाले लोगों को नागरिकता नहीं दी जाएगी।

कौन नहीं है भारतीय नागरिक?

साल 1979 में असम में कई संगठनों ने प्रदर्शन किया। इन संगठनों की मांग थी कि जिनके पास उचित दस्तावेज नहीं हैं उनकी पहचान की जाए और उन्हें यहां से बाहर निकाला जाए। साल 1993 में भारतीय चुनाव आयोग ने दस्तावेज की पहचान के लिए घर-घर जाकर एक अभियान चलाया। इस अभियान में जिनकी नागरिकता संदिग्ध थी। उनकी जांच होनी थी। जांच में ये तय करना कि कौन भारतीय नागरिक हैं और कौन भारतीय नागरिक नहीं हैं।

कल्याणकारी योजनाओं का नहीं ले पाते लाभ

यहां ऐसे ही संदिग्ध वोटरों की जांच होती है, जिनकी नागरिकता तय नहीं हो पाती। ऐसे लोगों के नाम के आगे ‘डी’ लगा दिया जाता है और उन्हें वोट देने से रोक दिया जाता है। इसके अलावा, ये सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते। हालांकि, ऐसे वोटरों के आंकड़े अलग-अलग हैं, चुनाव आयोग के मुताबिक़, साल 1997 में 3.13 लाख लोगों की पहचान डी-वोटर्स के तौर पर की गई थी। फरवरी 2024 में असम सरकार की तरफ से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मतदाता सूची में करीब 97,000 डी-वोटर्स हैं। 

सवालों के घेरे में नागरिकता

एक वेबसाइट में छपी खबर के मुताबिक कई मामलों में डी-वोटर्स का निर्धारण मनमाने तरीके से किया गया है और कुछ ऐसे भी मामले भी सामने आए हैं जिन्हें भारतीय नागरिक तो मान लिया गया है लेकिन उन्हे ‘डी’ वोटर्स की श्रेणी में रखा गया है। इन वोटरों की नागरिकता सवालों के घेरे में है। इसीलिए इन्हें अब तक मतदान करने का हक नहीं मिल पाया है। हर बार चुनाव से पहले हर पार्टी इस समस्या को सुलझाने का वादा करती है। साल 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए  लागू हो चुका है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी धर्म के लोगों को अवैध अप्रवासी नहीं माना जाएगा।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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