Former PM Gulzarilal Nanda : जब एक-एक पैसे के लिए होना पड़ा तंग

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Former PM Gulzarilal Nanda : जब एक-एक पैसे के लिए होना पड़ा तंग
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https://www.youtube.com/watch?v=aomOK20p7AM

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बुलंद आवाज, व्यक्तित्व सहज

प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर मजदूरों की बुलंद आवाज बने। देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जेल गए। विधायक बने, सांसद बने। कई सारे अहम मंत्रालयों के मंत्री का पद संभला। 13-13 दिन के लिए दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। कभी किसी से नहीं डरते। जब एहसास हुआ कि राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। ये बदल गई है। तो दूरी बना ली। साल 1997 में भारत रत्न से सम्मानित गुलजारी लाल नंदा की जो ईमानदार इतने कि कभी भी परिवार को अपने रसूख का लाभ नहीं लेने दिया और ना ही परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीति में आने दिया। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन लेने से मना कर दिया। बस से सफर करते, और पूरी जिंदगी किराए के घर में रहे। अपने लिए खुद का एक घर भी नहीं बनवा सके।

सियालकोट से निकलकर अहमदाबाद में बसे

तारीख 4 जुलाईसाल 1898। तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी। बुलाकी राम नंदा और ईश्वर देवी नंदा पाकिस्तान के सियालकोट में रहते इन्ही के घर एक बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा - गुलजारी लाल नंदा। शुरुआती पढ़ाई सियालकोट और लाहौर में की फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। जहां से कानून की डिग्री लीफिर पोस्ट ग्रेजुएशन किया और 22-23 की उम्र तक नेशनल कॉलेजमुंबई में बतौर प्रोफेसर लग गए। पत्नी के रूप में लक्ष्मी देवी भी जिंदगी में दाखिल हो चुकीं थी। दो बेटे महाराज कृष्ण मेहतानरिंदर नंदा और एक बेटी पुष्पा नाइक हुईं। फिर एक गुजरात बस गए।

दरअसलसाल 1921 में गांधीजी से मिले तो असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और उन्ही के कहने पर अहमदाबाद की टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री में लेबर एसोसिएशन के सचिव का पद संभाला। और फिर मजदूरों की समस्याओं का समाधानउनके अधिकारों के लिए लड़ते-लड़ते लंबा वक्त गुजरा। साल 1932 सत्याग्रह और साल 1942 भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल भी गए। आजादी के पहले बॉम्बे सरकार में श्रम और गृह निर्माण मंत्री भी रहे। आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। साल 1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद और साल 1966 लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए।

और फिर एक एक दिन बदलते सियासी घटनाक्रम से मन खिन्न हुआ तो राजनीति से संन्यास ले लिया। साल 1975 में वो रेल मंत्री थे। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई को उनके खिलाफ हो गए। इसी नाराजगी की वजह से चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। इंदिरा गांधी मनाने आईंलेकिन वो अपने फैसले पर अटल रहे। उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा कि आपके पिता नेहरू जी ने देश में लोकतंत्र को सींचकर मजबूत बनायाआपने इमरजेंसी लगाकर गलत किया।’ सियासत को अलविदा कहने के बाद गुलजारीलाल नंदा समाज और धर्म की सेवा में लग गए। ‘नवजीवन संघ’ व ‘मानव धर्म मिशन’ में काम करने लगे। दोनों संगठनों की नींव उन्होंने ही रखी थी।

एक राजनेता के साथ अच्छे लेखक भी

गुलजारीलाल नंदा अच्छे पॉलिटिशियन के साथ अच्छे लेखक भी थे उन्होंने कई सारी किताबें लिखी। फिजूलखर्ची के सख्त खिलाफईमानदार और सिद्धांतवादी शख्स। बेहद साधारण जीवन जीते। फिर एक दौर आया कि उन्हें एक-एक पैसे के लिए तंग होना पड़ा। दरअसल उन्होंने राजनीति छोड़ी तो आजीविका का साधन नहीं बचा। तमाम कठिनाई ने घेरा।

किराया नहीं दे पाए तो घऱ से निकाला

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ में लिखते हैं कि 'गुलजारीलाल नंदा को अक्सर दिल्ली के कनॉट प्लेस में बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते देखा जाता। वो बस से आया-जाया करते। कोई घर नहीं बनवा पाए तो जिंदगी के आखिरी दिनों में किराये के घर में रहते।उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में 500 रुपये की पेंशन स्वीकृत हुई थी। पर उन्होंने इसे लेने से मना कर दिया। कहा कि पेंशन के लिए उन्होंने लड़ाई नहीं लड़ी थी। बाद में दोस्तों ने समझाया कि किराये के मकान में रहते हैं तो किराया कहां से देंगे तब कहीं जाकर पेंशन ली।

सरकार से नहीं ली किसी भी प्रकार की मदद

रशीद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि 'गुलजारीलाल नंदा के आर्थिक हालत इतने खराब हो गए कि एक बार किराया न देने के चलते मकान मालिक ने उन्हें घर से निकाल दिया।' ये खबर अखबारों में तो अगली सुबह छपी को पूरा का पूरा सरकारी अमला घर पहुंचा। मकान मालिक को पता चला कि उसने कितनी बड़ी भूल कर दी है। गुलजारी लाल नंदा ने सरकार से किसी भी तरह की मदद लेने से मना कर दिया। इसके बाद अहमदाबाद में अपनी बेटी के पास चले गए। उम्र करीब 100 साल हो चुकी थी। 15 जनवरी साल 1998 गुलजारी लाल नंदा ने दुनिया को अलविदा कहा दिया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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