Gama Pahalwan : जिनके सभी बेटों की हो गई थी मौत

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ये कद काठी तो सामान्य है। लेकिन

इतना सारा कुछ खाने के बाद 15 घंटे कसरत करते हो।

05 दशक के लंबे करियर में 5000 मुकाबले

चौंक गए न। जब भी ताकत की बात होती है तो सबसे पहले जुबां एक ऐसे पहलवान का नाम आता है जो पांच दशक के लंबे करियर में करीब 5000 से ज्यादा मुकाबले लड़े और कोई नहीं हारे। भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया। आज कहानी गामा पहलवान की। जो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में रहे। दंगों में मुसलमान होते भी पाकिस्तान में हिंदुओं के मददगार बनें। पर जिंदगी तो जिंदगी है। आखिरी पल इन्हें भी बेबसी और लाचारी के सिवा कुछ नहीं मिला।

10 साल की उम्र में 400 पहलवानों में बने विजेता

पहलवान मोहम्मद अजीज बख्श बट - जो कश्मीर के मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते। इनकी फैमिली जो पैदा हुए पहलवान ही हुए। इन्हीं के घर 22 मई, साल 1878 को एक बेटे का जन्म हुआ - नाम रखा - गुलाम मोहम्मद बख्श बट उर्फ गामा पहलवान। इनके जन्मस्थान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है कोई पंजाब के अमृतसर जिले के जब्बोंवाल गांव का बताता है तो कोई मध्य प्रदेश का दतिया। ये पढ़े लिखे नहीं थे। घर में सब कुश्ती करते तो इनका रुझान भी कुश्ती में ही गया। छह साल के हुए तो पिता का इंतकाल हो गया। नाना ने पाला और मामा ने कुश्ती के दांव पेंच सीखाये। साल 1888। राजस्थान के जोधपुर में स्ट्रांग मैन प्रतियोगिता में 400 से ज्यादा पहलवानों ने हिस्सा लिया। जिनमें कई तो राष्ट्रीय स्तर के पहलवान थे। उस वक्त 10 साल की उम्र में गामा पहलवान भी जोधपुर गए। सबकी नजरें इंन्ही पर जा टिकीं। ये टॉप 15 विजेताओं में शामिल हुए थे बाद में उनकी उम्र को देखते हुए जोधपुर के महाराजा ने इन्हें विजेता घोषित किया। इनाम की राशि तो मिली साथ में दतिया और पटियाला के तत्कालीन महाराजा ने गामा पहलवान के प्रशिक्षण का खर्च उठाने की जिम्मेदारी ली।

जब मिला रुस्तम-ए-हिंद का खिताब

1895। कश्मीरी पहलवान और तत्कालीन रुस्तम-ए-हिंद और निर्विवाद भारतीय कुश्ती चैंपियन रहीम बख्श सुल्तानी वाला, ज्यादा अनुभवी और 7 फीट लंबे, उनकी फैन फालोइंग भी जबरदस्त। जब 17 साल की उम्र में गामा पहलवान उनसे भिड़े तो मुकाबला टक्कर का रहा। नाक और कान से खून बहने के बावजूद गामा पहलवान ने रहीम पहलवान से हार नहीं मानी। गामा पहलवान को रुस्तम-ए-हिंद तो घोषित नहीं किया, लेकिन उन्हें उसका पहला दावेदार मानने लगे थे। फिर साल 1910 में एक बार फिर रहीम बख्श सुल्तानी वाला और गामा पहलवान भिड़े। घंटों के संघर्ष के बाद गामा पहलवान शीर्ष पर रहे इस बार उन्हें रुस्तम-ए-हिंद का खिताब मिला।

जॉन बुल बेल्ट और 250 पाउंड का इनाम

साल 1910। ये ही वो वक्त था जब गामा पहलवान अंतरराष्ट्रीय इवेंट में हिस्सा लेने के लिए लंदन गए। पर रोड़ा बना उनका छोटा कद। जिसकी वजह वो इवेंट में हिस्सा लेने से चूक गए। फिर उन्होंने एक खुली चुनौती दे दी कि ‘मैं किसी भी भार वर्ग के किन्हीं तीन पहलवानों को 30 मिनट में हरा सकता हूं।’ पर किसी ने भी इस चुनौती पर ध्यान नहीं दिया। लंबा वक्त गुजरा। आखिरकार एक अमेरिकी पहलवान 'डॉक्टर' बेंजामिन रोलर ने चुनौती ली। मुकाबले में गामा पहलवान विजेता बने और इस जीत ने उन्हें स्थापित किया। अगले ही दिन एक के बाद एक 12 पहलवानों से लड़े और सभी को पछाड़ दिया। इनके सामने पहली बड़ी चुनौती पोलैंड के विश्व चैंपियन स्टैनिस्लॉस ज़बीस्ज़्को थे। पर उन्होंने ज़बीस्ज़्को को चित्त कर जॉन बुल बेल्ट, विश्व चैंपियन का टैग और 250 पाउंड का इनाम अपने नाम किया। साल 1927 में ज़बीस्ज़को पटियाला में गामा पहलवान से एक फॉलो-अप मुकाबले में फिर भिड़े, लेकिन यहां भी वो हार गए और इस जीत के लिए गामा पहलवान को एक नाम भी मिला - टाइगर। स्विट्जरलैंड के मौरिस डेरियाज़ और जोहान लेमयूरोपीय चैंपियन स्वीडन के जेसी पीटरसन जैसे पहलवानों को हरा कर गामा पहलवान ने पूरी दुनिया में अपना नाम कमाया। साल 1929 में, गामा ने जेसी पीटरसन को हराया। ये उनके करियर का आखिरी मुकाबला था।

दंगों में हिंदुओं के बने रक्षक

ये वक्त वो था जब गामा पहलवान की उम्र 51 साल की हो चुकी थी। साल 1947 में देश बंटा तो गामा पहलवान ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया। लाहौर के मोहनी रोड को ठिकाना बनाया। जहां हिंदू आबादी थी। हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़का तो गामा पहलवान ने अपने पड़ोसी हिंदुओं को दंगाईयों से बचाया। वो अपने साथियों के साथ दंगे वाले इलाके जाते और कई मौकों पर सशस्त्र भीड़ से लड़ते। उनकी कद काठी देखकर तमाम दंगाई उनको देख कर ही भाग जाते। वो कई हिंदुओं को व्यक्तिगत रूप से सीमा पार ले गए। उन्होंने सारा पैसा खर्च किया।

आखिरी वक्त बेहद मुशिकुलों में बीता

लेकिन गामा पहलवान को खुद जिंदगी के आखिरी दिनों में मुश्किलें का सामना करना पड़ा। दरअसल इन्होंने दो शादी की थी। एक पत्नी का नाम वज़ीर बेगम था। पांच बेटे और चार बेटियां कुल मिलाकर नौ बच्चे थे। दुर्भाग्य की बात ये थी कि उनके सभी बेटों की कम उम्र में ही मौत हो गई थी। सरकार से भी बहुत कम सहयोग मिला। उन्होंने अपने मेडल बेच कर जिंदगी का गुजारा किया। जब तक सरकार उनकी तरफ ध्यान देती तबतक उनका निधन हो गया। 23 मई साल 1960 82 साल की उम्र में गामा पहलवान दुनिया छोड़ कर चले गए। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी कलसून नवाज, गामा पहलवान की ही पोती हैं। वड़ोदरा के म्यूजियम में एक पत्थर रखा हुआ जिसका वजन 1200 किलो है। जिसमें लिखा हुआ है “ये पत्थर 23 दिसंबर साल 1902 को गुलाम मोहम्मद उर्फ गामा पहलवान ने उठाया था।”

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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