Habib Tanvir : आम आदमी का खास नाटककार

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जब बलराज साहनी ने मारा जोरदार थप्पड़

एक बार एक नाटक की रिहर्सल चल रही थी। एक्टर बलराज साहनी उस नाटक को डायरेक्ट कर रहे थे। तभी उन्होंने पाया कि एक कलाकार डायलॉग बार-बार भूल रहा है। कई बार टोकने के बाद बलराज साहनी झल्ला गए। उन्होंने उस कलाकार को एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। इसके बाद उस कलाकार ने डायलॉग बोला और बिल्कुल सही बोला। बलराज साहनी ने कहा 'थियेटर में एक जरूरी चीज होती है जिसे 'मसल मेमोरी' कहते है। ये जो थप्पड़ तुम्हें पड़ा है, यही 'मसल मेमोरी' है, जिससे तुम्हें डायलॉग एक बार में याद हो गया।बलराज साहनी से थप्पड़ खाने वाले ये कोई और नहीं बल्कि 50 सालों तक थियेटर करने वाले महान रंगकर्मी थे।

‘आसानी से समझ में आनी चाहिए मंच पर कहानी’

पूरी दुनिया में नाट्य कला की पहचान बने, एक्टर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राइटर, गीतकार, सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर हबीब तनवीर ने 100 से ज्यादा नाटकों का मंचन व सर्जन किया। आम आदमी के खास नाटककार जिन्होंने अपने रंगकर्म में लोक शैली, लोक परंपराओं दिखाया। वो जो बुद्धिजीवियों में जितना स्वीकार्य हुए उतने ही आम लोगों में लोकप्रिय। जो अपनी उम्र से 10 साल बड़े बलराज साहनी को गुरु मानते थे। थियेटर को और करीब से समझने यूरोप गए। उनकी पॉपुलैरिटी की बड़ी वजह, जो उन्हें इंग्लैंड में थियेटर की पढ़ाई के वक्त मिली थी कि मंच पर कहानी दर्शकों को आसानी से समझ में आनी चाहिए। उनकी कंट्रोवर्सी की बड़ी वजह भी इंग्लैंड बना। एक राज था जो उनके निधन के बाद सबके सामने आया।

बड़े भाई से मिली प्रेरणा

30 का दशक था। पेशावर, पाकिस्तान के रहने वाले हफीज अहमद खान को रायगढ़ छत्तीसगढ़ की एक लड़की से प्यार हुआ, शादी की और रायगढ़ में बस गए। इन्हीं के घर एक सितंबर, साल 1923 को बेटा हुआ। नाम रखा - हबीब अहमद खान। पढ़ने में होशियार थे। छत्तीसगढ़ में शुरुआती पढ़ाई की नागपुर के मॉरिस कॉलेज से बीए और फिर उर्दू में एमए करने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए। हबीब तनवीर के वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘मेरे बड़े भाई थियेटर किया करते थे। मैं अक्सर उनके नाटक देखता। उन्ही की प्रेरणा से मैंने भी 11-12 साल की उम्र में रंगमंच में कदम रखा। लेकिन मैंने बतौर रंगकर्मी अपनी यात्रा साल 1948 में मुंबई इप्टा से शुरू की।’

नौकरी करने के लिए गए मुंबई

दरअसल वो मुंबई नौकरी करने गए थे। उनकी ऑल इंडिया रेडियो में बतौर जर्नलिस्ट काम करने गए थे। उनका मिलना-जुलना फिल्मी कलाकारों से होने लगा। इस दौरान गीत-गजल भी लिखने लगे। अपने नाम के आगे 'तनवीर' तखल्लुस जोड़ा और हबीब अहमद खान से हबीब तनवीर बन गए। उन्होंने फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी। साल 1953 की फिल्म 'फुटपाथ' से एक्टिंग करियर की शुरुआत की और ये सफर साल 1982 की 'गांधी', 1991 की 'प्रहार', 2005 की 'द राइज़िंग: मंगल पांडे' और 2008 की 'ब्लैक & व्हाइट' जैसी फिल्म तक जारी रहा।

मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से जर्मनी

साल 1954 में वो मुंबई से दिल्ली आ गए और 'हिंदुस्तानी थियेटर' से जुड़े। यहां काम करने के दौरान उनकी मुलाकात एक्ट्रेस मोनिका मिश्रा से हुई। दोनों में प्यार हुआ और साल 1955 में शादी की। दोनों की एक बेटी नगीना तनवीर हुई। एक वेबसाइट की खबर के मुताबिक,  बेटी नगीना तनवीर के हवाले लिखा गया है कि हबीब तनवीर जर्मन नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त से प्रभावित थे। उनसे मिलने के लिए साल 1955 में बर्लिन गए। लेकिन अफसोस ये मुलाकात नहीं हो पाई। दरअसल एक तब तक बर्तोल्त दुनिया से रुखसत हो गए थे। फिर हबीब तनवीर 08 महीने तक जर्मनी में रहे। वहां बर्तोल्त ब्रेख्त के नाटक देखे। जर्मन थियेटर आर्टिस्टों से मिले। वो थियेटर की बारीकियां सीखने के लिए ब्रिटेन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट में पढ़ने लगे। पैसे नहीं थे तो फल बेचे, सर्कस में काम किया। नाइट क्लब में भी गाया।

'नया थियेटर' की शुरुआत

साल 1959 में भारत लौटे पत्नी मोनिका मिश्रा के साथ मिलकर 'नया थियेटर' नाम से एक थियेटर ग्रुप की नींव रखी और पहला नाटक 'आगरा बाजार' किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ लोकनृत्य को थियेटर से जोड़कर रंगमंच को नई परिभाषा दी। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय थियेटर का ऐसा सामंजस्य बैठाया कि पूरी दुनिया की निगाहें उनके नाटक पर गई।

नाटकों को मिली पूरी दुनिया में पहचान

साल 1982 में इनका नाटक 'चरणदास चोर' 'एडिनबरा इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल' में सम्मानित होने वाला पहला भारतीय नाटक बना। 'शतरंज के मोहरे', 'मिट्टी की गाड़ी','द ब्रोकन ब्रिज', 'ज़हरीली हवा' और 'राज रक्तजैसे नाटकों ने गहरी छाप छोड़ी। उनका नाटक 'पोंगा पंडित' विवादों में रहा। साल 1969 में 'संगीत नाटक एकेडमी अवॉर्ड', 1983 में 'पद्मश्री', 1990 में 'कालिदास सम्मान', 1996 में 'संगीत नाटक एकेएमी फेलोशिप', 2002 में 'पद्म भूषण' से सम्मानित हबीब तनवीर को फ्रांस सरकार ने भी अपने प्रतिष्ठित सम्मान 'ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स' से नवाजा है।

रंगमंच के साथ सत्ता पर भी पकड़

हबीब तनवीर की जितनी पकड़ रंगमंच पर थी उतनी ही मजबूती वो समाज, सत्ता और राजनीति पर भी रखते थे। साल 1972 से लेकर 1978 तक 'राज्यसभा सदस्य' रहे हबीब तनवीर एक इंटरव्यू में कहते हैं कि 'रंगमंच एक पॉलिटिकल टूल की तरह भी हैं। समाज और सत्ता से काटकर किसी भी क्षेत्र को न देखा जा सकता है, न ही समझा जा सकता है तब रंगमंच कैसे अपवाद हो सकते हैं।' 8 जून, साल 2009 वो अपने 'नया थियेटर' ग्रुप के 50 साल पूरे होने पर खुश थे पर उसी साल उन्होंने 85 साल की उम्र में जिंदगी के रंगमंच से अलविदा कह दिया।

इंग्लैंड में रह रहा था एक परिवार

दरअसल जब साल 1955 में जब यूरोप गए थे तो पेरिस में उनकी मुलाकात जिल मैकडोनाल्ड से हुई। दरअसल जिल एक एक्ट्रेस थीं। हबीब तनवीर जब जिल से मिले तो पहली नजर में दिल दे बैठे। उस वक्त जिल 17 साल की थीं और हबीब 32 साल के। दोनों में प्यार हुआ और जिल ने एक बेटी ऐना को जन्म दिया। ये बात अपने घर वालों से हबीब तनवीर ने कई सालों तक छिपाये रखी। जिल की बेटी ऐना तनवीर का एक बेटा हुआ। मुक्ति तनवीर। उन्होंने साल 2016 में अ स्टोरी फॉर मुक्ति नाम से एक किताब प्रकाशित की। जिसमें हबीब तनवीर के वो खतों का संकलन है जो कि उन्होंने भारत लौटने के बाद जिल मैकडोनाल्ड को लिखे थे।

जब अपने पैर पीछे हटा लिए

जिल इस किताब में लिखती हैं कि 'जब हबीब को पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं तो उसने अपने कदम वापस खींच लिए। मेरी मां उस वक्त हबीब के इस तरह खामोशी से चले जाने से बहुत नाराज हुई थीं।' साल 1973 में हबीब तनवीर की, बेटी ऐना से मुलाकात। उसके बाद ऐना लगातार उनके निधन तक उनके संपर्क में रहीं। जाते जाते हबीब तनबीर का एक शेर याद आ रहा है।

बे-महल है गुफ़्तुगू हैं बे-असर अशआर अभी

ज़िंदगी बे-लुत्फ़ है ना-पुख़्ता हैं अफ़्कार अभी

पूछते रहते हैं ग़ैरों से अभी तक मेरा हाल

आप तक पहुंचे नहीं शायद मिरे अशआर अभी

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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