जूनागढ़ रियासत के नवाब मोहम्मद महाबत खानजी III रसूल खानजी ने आजादी के बाद पाकिस्तान में शामिल करने की कोशिश की। इस बात की वजह से इन्हें नहीं जाना जाता। बल्कि ये कुत्तों के लिए अपनी मोहब्बत के लिए मशहूर हैं।

इंसानों के लिए नहीं कुत्तों के लिए मोहब्बत
22 जनवरी, साल 1911 मोहम्मद महाबत खानजी III रसूल खानजी, गुजरात के जूनागढ़ रियासत की गद्दी पर बैठे। वो नवाब जिसने जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल करने की कोशिश की। पर मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए। पर सिर्फ इस बात की वजह से इन्हें नहीं जाना जाता। बल्कि ये नवाब सबसे ज्यादा मशहूर हैं अपनी मोहब्बत के लिए और उससे भी बड़ी बात। ये मोहब्बत इंसानों के लिए नहीं बल्कि कुत्तों के लिए है। वो भी एक-दो कुत्ते नहीं बल्कि इनके पास 800 से ज्यादा कुत्ते थे

एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही थी सरकार
15 अगस्त, साल 1947, भारत आजाद हुआ। लोग खुशी से झूम उठे। लेकिन सरकार एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही थी। ये चुनौती थी देश की छोटी-बड़ी कुल 565 रियासतों को भारत में विलय कराने की। ये जिम्मा तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के कंधों पर था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा के एक लेख के मुताबिक, सरदार पटेल को तेज-तर्रार और कड़क अफसर वीपी मेनन का साथ मिला। जिसके बाद ज्यादातर रियासतों ने थोड़ी बहुत ना-नुकर के बाद भारत का हिस्सा बनने की बात स्वीकार ली।

नवाब को मिली थी नाइट की उपाधि
ऐसा कहा जाता है कि हैदराबाद सबसे धनवान रियासत थी और इसके बाद नंबर आता था जूनागढ़ का। जूनागढ़ रियासत जहां की गद्दी बैठे थे 2 अगस्त साल 1898 को जन्मे नवाब मोहम्मद महाबत खानजी III रसूल खान जी जिनको साल 1926 में नाइट की उपाधि भी मिली थी। वो नवाब जिसने जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल करने की कोशिश की। इनकी गुजरात के शेरों और गायों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है और इसके साथ ही ये अपने असाधारण रहन सहन और कुत्तों के प्रति बेहद अनोखे प्रेम के लिए जाने जाते हैं।

कुत्तों की देखरेख के लिए लगाए गए थे नौकर-चाकर
इतिहासकार परिमल रूपाणी के एक लेख के मुताबिक, नवाब महाबत खान के पास करीब 800 कुत्ते थे। जिनको पालने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई थी जैसे कि ये इंसान हों। उस वक्त नवाब साहब अपने हर कुत्ते पर मौजूदा वक्त के हिसाब महीने में करीब एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर देते थे। कुत्तों की देखरेख के लिए नौकर-चाकर लगाए गए। साथ ही उनके लिए अलग-अलग कमरे, बिजली और टेलीफोन की भी व्यवस्था थी। इतना ही नहीं, इन कुत्तों की शादी से लेकर इनके मरने तक रुपया पानी की तरह बहाया जाता। किसी कुत्ते की मौत होने के बाद उसे तमाम रस्मों-रिवाज के साथ कब्रिस्तान में दफनाया जाता। इसकी शाही शव यात्रा निकाली जाती।

कुत्ते की शादी पर खर्च कर दिए 10 करोड़
एक दौर वो आया जब नवाब महाबत खान इन कुत्तों से अनोखे प्रेम के लिए दुनिया भर में मशहूर हुए। हुआ यूं कि भले ही नवाब साहब के पास 800 कुत्ते थे पर वो सबसे ज्यादा प्यार 'रोशना' नाम की एक कुतिया से करते थे। इतिहासकार डॉमिनिक लैपियर और लैरी कॉलिन्स ने अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में इस बात का जिक्र किया है कि नवाब महाबत खान ने 'रोशना' (कुतिया) को अपनी बेटी की तरह मानते। जिसकी शादी अपने दूसरे कुत्ते 'बॉबी' से बड़ी धूमधाम से कराई। जिस तरह से कोई अमीर पिता अपनी बेटी की शादी करता हो। 'रोशना' को सोने के हार, ब्रेसलेट और महंगे कपड़े पहनाए गए। इसके साथ ही 250 कुत्तों ने 'मिलिट्री बैंड' के साथ 'गार्ड ऑफ ऑनर' से रेलवे स्टेशन पर 'रोशना' और 'बॉबी' का स्वागत किया। 'रोशना' और 'बॉबी' की शादी कितनी खास कि इस शादी में तमाम राजा-महाराजाओं के साथ वायसराय लॉर्ड इरविन को भी निमंत्रण भेजा गया। 'वायसराय' तो नहीं आए पर करीब 1.5 लाख से ज्यादा मेहमान इस शादी का हिस्सा बने। शादी में मौजूदा वक्त के हिसाब से करीब 10 करोड़ रुपये खर्च कर दिए।

राजा-रजवाड़ों और नवाबों का खत्म हुआ दौर
अपनी बेगम भोपाल बेगम के कहने पर नवाब महाबत खान ने 'जूनागढ़' रियासत के पाकिस्तान से विलय करने की घोषणा कर दी। इसके बाद जूनागढ़ की जनता नवाब के खिलाफ प्रदर्शन करने लगी। जूनागढ़ हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र था। मुसलमान 15 फीसदी और हिंदू 85 फीसदी थे। इस वजह से जनता पाकिस्तान नहीं भारत में मिलना चाहती थी। यहां की जनता के समर्थन में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सेना को जूनागढ़ भेजा।

नवाब ने पाकिस्तान जाने का बनाया मन
उधर, 20 फरवरी, साल 1948 को जनमत संग्रह के लिए वोटिंग हुई। जिसमें जनता ने भारत में रहने के पक्ष में वोट डाले। 25 फरवरी, साल 1948, जूनागढ़ में 37 साल राज करने के बाद नवाब महाबत खान ने मतदान के नतीजों का भी इंतजार नहीं किया और उससे पहले ही पाकिस्तान के लिए निकल गया। इतिहासकार परिमल रूपाणी के एक लेख के मुताबिक, नवाब महाबत खान कराची के लिए जब निकले तो इसके लिए एक प्लेन में बैठे, तभी उन्हें पता चला कि उनकी एक बेगम अपनी बच्ची को लेने के लिए महल में गई है और अभी तक लौटी नहीं। तब उसने बेगम की जगह पर चार कुत्तों को प्लेन में बैठाया और ये कहते हुए उड़ गया कि 'बेगम तो पाकिस्तान में भी मिल जाएगी, लेकिन वहां ये कुत्ते नहीं मिलेंगे।' 7 नवंबर, साल 1959 61 साल की उम्र में पाकिस्तान के कराची में नवाब महाबत खान का निधन हो गया।
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