Actor Mac Mohan : कई सारी खूबियां और एक गलत आदत

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जब फिल्म के क्रेडिट्स में गलत नाम लिख गया

साल 1964, डायरेक्टर चेतन आनंद की फिल्म 'हकीकत' रिलीज हुई। इस फिल्म के क्रेडिट्स में गलती से एक एक्टर का नाम मोहन माखिजानी की जगह बृजमोहन लिख दिया गया। उधर मोहन माखिजानी के दोस्त उन्हें 'माखिजानी' का शॉर्टकट 'मैकी' कहकर बुलाते थे। उस वक्त फिल्मफेयर मैगजीन के संपादक हुआ करते थे एलपी राव। उन्होंने जब फिल्म 'हकीकत' का रिव्यू किया तो इसी 'मैकी' का इस्तेमाल करते हुए मोहन माखिजानी को नया नाम दिया - 'मैकमोहन'

लोगों के जेहन में बसा संबा का किरदार

वो मैकमोहन, जिन्होंने साल 1975 की फिल्म 'शोले' में गब्बर के साथी सांबा का किरदार निभाया तो हमेशा के लिए लोगों के जेहन में बस गए। वो मैकमोहन, जो बेहतरीन क्रिकेटर थे और मुंबई आए भी इसीलिए थे कि क्रिकेट को करियर बना सकें।

कई फिल्मों में कैरेक्टर का नाम रहा वास्तविक नाम

वो जिन्होंने कई साल जद्दोजहद की। लोगों को इनकी एक्टिंग तो पसंद आती पर इन्हें काम नहीं मिलता। रास्ता सिर्फ एक था जीतोड़ मेहनत का, और इसी जीतोड़ मेहनत ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचा दिया। हिंदी के साथ बेहतरीन अंग्रेजी बोलने और लिखने में सक्षम मैकमोहन एकमात्र ऐसे एक्टर थे, जिनका वास्तविक नाम 'मैक' कई फिल्मों में उनके कैरेक्टर के नाम के रूप में इस्तेमाल किया गया। ये रियल लाइफ में बेहद रोमांटिक भी थे। कैसे उनका दिल एक डॉक्टर पर आया और उनसे शादी की। किताबें पढ़ने के बेहद शौकीन थे, अखबार पूरा पढ़ने की आदत थी पर उन्हें एक बुरी आदत भी थी जिसने सब कुछ खत्म कर दिया।

मां बीमार हुईं तो परिवार मुंबई हुआ शिफ्ट

24 अप्रैल, साल 1938, पाकिस्तान के कराची में मोहन माखिजानी का जन्म हुआ। पिता ब्रिटिश फौज में कर्नल। उनका ट्रांसफर होता रहता। कभी मसूरी तो कभी दिल्ली। वरिष्ठ फिल्म हिस्टोरियन शिशिर कृष्ण शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में मैक मोहन बताते हैं कि 'ये बात उस वक्त की थी जब हम लखनऊ में रहते थे। अचानक मां बीमार हो गईं। पिताजी ने मां के इलाज की बेहतर सुविधाओं को देखते हुए अपना ट्रांसफर मुंबई करा लिया और ऐसे मैं साल 1952 में मुंबई आ गया।'

किस्मत से क्रिकेटर से बनें एक्टर

दरअसल मैक मोहन को बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक था। वो लखनऊ में स्कूल और कॉलेज में क्रिकेट टीम के कैप्टन भी हुआ करते थे और फिर वो यूपी की टीम से खेले। वो क्रिकेट में ही करियर बनाना चाहते थे। मुंबई गए तो वहां भी पूरे जोशोखरोश से क्रिकेट खेलते। मैकमोहन ने एक दोस्त के कहने पर 'हिंदी परिषद' नाम की संस्था के नाटक में शौकिया तौर पर रोल किया। उस नाटक में शौकत आजमी भी काम कर रही थीं। वरिष्ठ फिल्म हिस्टोरियन शिशिर कृष्ण शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में मैक मोहन ने बताया था। 'मेरी एक्टिंग देखकर कुछ दिनों बाद शौकत आजमी ने मुझे 'इप्टा' के नाटक 'इलेक्शन का टिकट' में काम करने के लिए बुलाया। मैंने मना किया क्योंकि मेरा ध्यान क्रिकेट की तरफ था पर उनके कई बार कहने पर मुझे उस नाटक में काम करना ही पड़ा। पीडी शेनॉय के कहने पर 'फिल्मालय एक्टिंग स्कूल' से तीन साल का एक्टिंग कोर्स किया। कोर्स पूरा होने के बाद साल 1964 में पहली बार फिल्म 'हकीकत' में काम करने का मौका मिला।'

इतनी आसान नहीं थी राह

मैकमोहन की एक्टिंग तो पसंद की गई पर चार साल तक उन्हें कोई काम नहीं मिला। क्रिकेट भी छूट चुका था। ऐसे में साल 1966 की फिल्म 'आखिरी खत' में डायरेक्टर चेतन आनंद के साथ बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया। पर उन्होंने एक्टिंग का रियाज करना नहीं छोड़ा।  वरिष्ठ फिल्म हिस्टोरियन शिशिर कृष्ण शर्मा को दिए एक इंटरव्यू में मैक मोहन बताते हैं कि 'मैं रोज अपने घर की छत पर एक्टिंग की प्रैक्टिस करता, जोर-जोर से डायलॉग बोलता, चीखता-चिल्लाता। मेरी इस चीख-चिल्लाहट से पड़ोस में रहने वाले डायरेक्टर रघुनाथ झालानी इतने तंग आ गए थे कि साल 1969 की फिल्म 'आया सावन झूम के' में एक पागल का रोल दिया। फिर साल 1972 की डायरेक्टर रवि टंडन की फिल्म 'अनहोनी' में विलेन का रोल मिला।' डायरेक्टर रवि टंडन, मैकमोहन के बहनोई और एक्ट्रेस रवीना टंडन के पिता हैं। इस रिश्ते से मैकमोहन रवीना टंडन के मामा लगे। फिल्म 'आया सावन झूम के' और 'अनहोनी' ये दोनों ही फिल्में हिट हुईं और मैकमोहन की गाड़ी चल पड़ी।

47 करियर में करीब 200 फिल्में कीं

मैक मोहन ने अपने 47 करियर में करीब 200 से ज्यादा फिल्मों में हर बड़े एक्टर और डायरेक्टर के साथ के साथ काम किया। लेकिन सबसे ज्यादा पहचान साल 1975 की फिल्म 'शोले' में सांबा रोल के लिए मिली। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ इंग्लिश, रूसी और स्पेनिश फिल्मों में डायलॉग दिए। वो छोटे परदे पर भी नजर आए।

जब डॉक्टर से हुआ प्यार

साल 1986 में मैक मोहन ने मिनी से शादी की। मिनी से उनकी मुलाकात एक अस्पताल में हुई। दरअसल मैक मोहन के पिता की तबीयत खराब हुई तो वो अपने पिता को जुहू आरोग्य निधि अस्पताल ले गए। वहां मिनी बतौर डॉक्टर काम कर रही थीं। मैक पर्दे पर जैसे दिखते थे, रियल लाइफ में उनकी पर्सनैलिटी बिल्कुल अलग थी। वो अंग्रेजी काफी अच्छी बोलते और लिखते थे। मैक मोहन की पर्सनैलिटी से मिनी काफी प्रभावित हुईं। दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआफिर वो शादी के बंधन में बंध गए। मैक मोहन और मिनी की 2 बेटियां - मंजरी माखिजानी, विनती माखिजानी और एक बेटा विक्रांत माखिजानी हुआ।

एक बुरी आदत ने छीन ली जिंदगी

2010 की फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे?' की शूटिंग शुरू ही की थी अचानक तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में भर्ती कराया गया। पता चला फेफड़ों में कैंसर हैं। एक बुरी आदत ने सब कुछ खत्म कर दिया था। दरअसल वो शराब और सिगरेट के आदी थे। वो सिगरेट इतनी पीते कि माचिस की जरूरत ही नहीं होती। वो एक सिगरेट से दूसरी को जला लिया करते। 10 मई साल 2010, 72 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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