Mahesh Bhatt : एक प्रेम कहानी जो इन्हें तकलीफ देती है

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महेश भट्ट के माता-पिता की दर्दभरी प्रेम कहानी: जो उन्हें तकलीफ देती है | Manchh न्यूज़

 

12 जून साल 1915 गुजरात के पोरबंदर में हिंदू ब्राह्मण फैमिली में नानाभाई भट्ट का जन्म हुआ। 1942 से 1988 तक करीब 50 से ज्यादा हिंदी और गुजराती फिल्में डायरेक्ट की। शादी हेमलता भट्ट से हुई। जिनसे सात बच्चे हुए जिनमें से एक हैं - फिल्म राइटर- रॉबिन भट्ट।

कहते हैं कि मोहब्बत हदों-सरहदों, जाति-धर्म की परवाह नहीं करती। कुछ ऐसे ही शादीशुदा होते हुए भी नानाभाई भट्ट का दिल अपने दौर की खूबसूरत एक्ट्रेस शिरीन मोहम्मद अली पर आ गया।

‘मुंबई की सेठानी’, ‘शमशीर-ए-अरब’और ‘पासिंग शो’ जैसी कई फिल्मों में काम करने वाली शिरीन और नानाभाई भट्ट दोनों शादी करना चाहते थे पर नहीं हुई।

 

वजह नानाभाई भट्ट हिंदू और शिरीन मोहम्मद अली मुसलमान। दोनों के बीच धर्म और समाज का बंधन आ गया।

दोनों बिना शादी कई साल रहे। ऐसे में नाना भाई भट्ट को दो परिवार हो गए। एक पत्नी हेमलता का, दूसरा प्रेमिका शिरीन का।

शिरीन और नानाभाई भट्ट के दो बेटे हुए। छोटे बेटे फिल्म प्रोड्यूसर मुकेश भट्ट है।

आज कहानी - 20 सितंबर साल 1948 को जन्में शिरीन और नानाभाई भट्ट के बड़े बेटे महेश भट्ट की, जिन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ और दर्द रहा कि मां शिरीन को कभी पत्नी का दर्जा नहीं मिला और न ही उन्हें समाज ने अपनाया।

शीरीन को बिन ब्याही मां कहा जातातो महेश भट्ट को नाजायज। पर इन तानों को भुलाकर महेश भट्ट पिता नानाभाई भट्ट की तरह फिल्म इंडस्ट्री में नाम कमाया। पर ये इतना आसान नहीं था

एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने बताया था कि -

मेरे पास मेरे पिता की कोई याद नहीं है। इसलिए मुझे पता ही नहीं कि, पिता की भूमिका क्या होनी चाहिए? मैं एक सिंगल मुस्लिम महिला शिरीन मोहम्मद अली का नाजायज बेटा हूं। मेरे पिता मेरे लिए अजनबी थे। उनका सरनेम मुझे मिलाजिस वजह से मैं महेश भट्ट हूं। मेरा नाम ‘महेश’ मेरे पिता ने ही रखा इस वजह से मुझे ये नाम कभी पसंद नहीं आया।'

महेश भट्ट ने पढ़ाई डॉन बॉस्को हाईस्कूलमुंबई से की। मां को कोई पहचान नहीं थीइसलिए उनके स्कूल के रिपोर्ट कार्ड पर मामा साइन करते।

आर्थिक हालात ठीक नहीं थे को छुट्टियों में जॉब करते। स्क्रिप्ट लिखने का शौक था तो प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन भी बनाते। इसी दौरान उनकी मुलाकात फिल्म डायरेक्टर राज खोसला से हुई। राज खोसला को महेश भट्ट का काम पसंद आया। फिर राज खोसला के असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में करियर की शुरुआत की।

वक्त गुजरा और 26 साल की उम्र में महेश भट्ट ने बतौर डायरेक्टर साल 1974 की फिल्म 'मंजिलें और भी हैंसे डेब्यू किया।

1979 की 'लहू के दो रंग', 1982 की अर्थ, 1984, सारांश, 1985 जानम, 1986 की नाम जैसी फिल्मों के बाद महेश भट्ट ने बॉलीवुड में अपनी पहचान बना ली। वहीं 1990 की आशिकी के बाद महेश भट्ट ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कई टीवी सीरियल और 100 से ज्यादा फिल्मों को प्रोड्यूस और उनका डायरेक्शन करने वाले महेश भट्ट ने जितना नाम अपनी फिल्मों से उतने चर्चे, निजी जिंदगी के रहे।

साल 1970 में 22 साल की उम्र में महेश ने स्कूल की दोस्त लॉरेन से शादी कर ली। लॉरेन ने अपना नाम बदलकर किरण भट्ट कर दिया। दो बच्चे हुए पूजा भट्ट और राहुल भट्ट। महेश और किरण की हैप्पी मैरिड लाइफ में तब खटास आनी शुरू हुईजब शादी के बाद महेश भट्ट का नाम एक्ट्रेस परवीन बाबी से जुड़ने लगा।

ये वो वक्त था जब महेश भट्ट की एक के बाद एक फिल्में फ्लॉप हो रही थी तो दूसरी तरफ परवीन बाबी संग उनका रिश्ता गहरा होता जा रहा था। फिर वो दिन भी आयापरवीन बॉबी के लिए किरण को छोड़ दिया। वक्त गुजरा महेश भट्ट और परवीन बाबी के बीच दूरियां आईं तो

वो किरण के पास दोबारा गए पर तब तक देर हो चुकी थी किरण से उनके रिश्ते खराब हो चुके थे। इसके बाद महेश भट्ट सोनी राजदान के प्यार मे पड़े।

1986 में किरण को बिना तलाक दिए हुए महेश भट्ट ने अपनी मां शिरीन का मुस्लिम धर्म अपनाया और अशरफ भट्ट के रूप में सकीना यानी सोनी राजदान से शादी की। सोनी राजदान के दो बेटियां हुई। शाहीन भट्ट और आलिया भट्ट।

वहीं पहली पत्नी किरण भट्ट का साल 2003 में 66 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

यूं तो महेश भट्ट के जिंदगी में कई विवाद हैं लेकिन साल 1980 में उनको काफी आलोचने झेलनी पड़ी।

दरअसल, जब एक पत्रिका के कवर पेज के फोटो के लिए उन्होंने अपनी बेटी पूजा भट्ट को किस लियाऔर ये भी कहा कि अगर पूजा भट्ट मेरी बेटी नहीं होती मैं उससे शादी कर लेता।

ऐसा कहा जाता है कि महेश भट्ट जो फिल्में बनाते उसमें कहानियां उनके जीवन से काफी मिलती। फिल्म जख्म जिसमें उनके पिता नानाभाई भट्ट और मां शिरीन मोहम्मद अली की प्रेम कहानी और उनके भट्ट के बचपन की कहानी है।

कि कैसे साल 1998 में मां शिरीन का देहांत हुआआखिरी इच्छा थी पति नानाभाई भट्ट उन्हें दफन करें। नानाभाई भट्ट पहुंचे, शिरीन की मांग में सिंदूर लगा दिया।

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि

मैंने अपनी मां को दफन करने की इच्छा जाहिर की तो पिता नानाभाई ने अपने धर्म का हवाला देते हुए आने से इनकार कर दिया।

24 अप्रैल 1998 के दिन मुंबई में नानाभाई भट्ट का भी निधन हो गया था।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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