Maulana Hasrat Mohani : आजादी और साहित्य के नाम की जिंदगी

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सबसे पहले उठाई पूर्ण स्वराज की मांग

'इंकलाब जिंदाबाद' - एक ऐसा नारा - जिसने गुलामी के दौर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को जोश से भर दिया। 'इंकलाब जिंदाबाद' जिसे भगत सिंह ने अमर किया और तब से अब तक कोई भी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करता हैं तो ये नारा उसकी जुंबा पर आ ही जाता है। सवाल ये है कि दिलों में तूफान भर देने वाला 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा किसने गढ़ातो जवाब ये है ये नारा आजादी के अजीमुश्शान सिपाही मौलाना हसरत मोहानी ने दिया। ये ही पहले शख्स थे कि जिन्होंने सबसे पहले पूर्ण स्वराज्य यानि भारत के लिए पूरी तरह से आजादी की मांग की थी।

कई सारी थी खूबियां

एक स्वतंत्रता सेनानी तो थे ही साथ में साहित्यकार, शायर ऐसे थे, जिनकी लेखनी में जिंदगी का हर रंग बड़ी सुंदरता से दिखता है। पत्रकार भी थे अपने लेखों से लोगों को आजादी के लिए जागरूक करते। संविधान सभा के सदस्य भी रहे कद्दावर सियासतदान थे और समाजसेवी भी। आज कहानी मौलाना हसरत मोहानी की जो एक उसूल परस्त और सच्चे मुसलमान थे इनकी इस्लाम के प्रति जितनी आस्था थी इतने ही बड़े ये भगवान श्रीकृष्ण के भी प्रशंसक थे। साल 1947 देश आजाद हुआ तो बंटवारे का दंश मिला। तब इन्होंने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया। पर उनकी शख्सियत का दम ही था पाकिस्तान में भी इन्हें बेहद सम्मान के नजरिये से देखा जाता है।

किसी बात से नहीं किया समझौता

01 जनवरी साल 1875, मौलाना हसरत मोहानी का जन्म यूपी के डिस्ट्रिक्ट उन्नाव हुआ। वास्तविक नाम था 'सैयद फ़ज़्लुल्हसन' और इनका उपनाम था 'हसरत'। इनके गांव का मोहान था। इसलिये ये इनका नाम 'मौलाना हसरत मोहानी' हो गया। पढ़ाई में अच्छे कि स्टेट की परीक्षा में टॉप किया। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। जहां छात्र दो दलों में बंटे थे। एक देशभक्त तो दूसरे स्वार्थभक्त। ये देशभक्त गुट में शामिल हुए। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई। किसी तरह का समझौता नहीं किया। जेल गए और तीन बार कॉलेज से निकाले गए। खैर साल 1903 में बीए पास किया।

मैगजीन 'उर्दू ए मुअल्ला' में अंग्रेजों के खिलाफ लिखते लेख

कॉलेज से निकलने के बाद एक मैगजीन 'उर्दू ए मुअल्लानिकाली। जिसमें वो आजादी के लिए लेख लिखा करते थे। साल 1904 में वो 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' में शामिल हुए। वो कांग्रेस के अधिवेशनों की रिपोर्ट अपनी मैगजीन में प्रकाशित करते। मौलाना हसरत मोहानी ने साल 1921 में कांग्रेस के अधिवेशन और बाद में मुस्लिम लीग के मंच से पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पेश किया पर इसे मंजूर कराने में वो कामयाब नहीं हो पाए। इस वजह से इन्होंने पहले कांग्रेस और बाद में मुस्लिम लीग से दूरी बना ली।

हर हालात में रहते थे खुश

भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के फाउंडर मेंबरों में से एक मौलाना हसरत मोहानी के दोस्त और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना सुलेमान नदवी अपने एक लेख में लिखते हैं कि 'अंग्रेजों ने 'उर्दू ए मुअल्ला' पत्रिका पर पाबंदी लगाई तो मौलाना हसरत मोहानी ने इसके विरोध में स्वदेशी स्टोर शुरू किया। स्वदेशी आंदोलन के हिमायती हसरत मोहानी ने दिसंबर की ठंडी रात में भी विदेशी कंबल ओढ़ने से मना कर दिया। मौलाना हसरत मोहानी की बेगम निशातुन्निसा ने भी आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। मौलाना हसरत मोहानी ने कभी समझौता नहीं किया और खुशी-खुशी सजाएं भुगतीं। आजादी की राह में मिलने वाले दुख-दर्द, राहत-खुशी एक जैसे ही थे। वो हर तरह के हालात में अपने आप को खुश रखना जानते थे।'

पाकिस्तान में भी हैं बेहद सम्मानित

'कुलियात-ए-हसरत', 'शरहे कलामे गालिब, 'नुकाते-ए-सुखन', 'मसुशाहदाते जिन्दां' किताबें लिखने वाले मौलाना हसरत मोहानी एक बेहतरीन साहित्यकार और शायर भी थे। उर्दू में महिलाओं जो प्रेयसी और दोस्त के रूप में और वक्त के साथ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुई दिखती हैं वो इन्हीं की ही देन है। उस्ताद गुलाम अली की आवाज से सजी गजल 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है...' ये गजल हसरत मोहानी ने लिखी है। सारी जिंदगी आजादी और साहित्य के नाम करने वाले मौलाना हसरत मोहानी 13 मई, साल 1951 को 76 साल की उम्र में दुनिया से रुखसत हो गए। हिंदुस्तान में तो हर साल मौलाना हसरत मोहानी को याद किया जाता है पर पाकिस्तान में भी इनकी याद में 'हसरत मोहानी मेमोरियल सोसायटी', 'हसरत मोहानी मेमोरियल लाइब्रेरी' और 'हसरत मोहानी ट्रस्ट' बनाए गए हैं। कराची में एक 'कॉलोनी' और 'सड़क' का नाम भी मौलाना हसरत मोहानी के नाम पर रखा गया है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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