Mohammed Aziz : 80 और 90 के दशक के नामचीन गायकों में शुमार, फिर क्यों मिली गुमनामी?

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Mohammed Aziz : 80 और 90 के दशक के नामचीन गायकों में शुमार, फिर क्यों मिली गुमनामी?
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आज कल याद कुछ और रहता नहीं...

अपनी आंखों में मुझको बसा लीजिए

अपने दिल में मेरा घर बना दीजिए

क्या करूं, दिल कहीं और लगता नहीं

प्यार में आपसे दिल लगाने के बाद

आज कल याद कुछ और रहता नहीं

एक बस आपकी याद आने के बाद

ये गाना है साल 1986 की फिल्म 'नगीना' का। गीतकार आनंद बक्षी, संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और जिन्होंने इस गाने को अपनी आवाज से सजाया है वो हैं 02 जुलाई, साल 1954 कोलकाता में एक गरीब मुस्लिम परिवार में जन्में सईद मोहम्मद अजीज उल नबी। वो रेडियो पर मोहम्मद रफी के गाने तल्लीन होकर सुनते। बचपन में शक्ल 'मरफी रेडियो' के एड वाले 'मुन्ने' जैसे दिखती तो लोग इन्हें प्यार से 'मुन्ना अजीज' कहते और जब अपनी आवाज के जादू से लोगों को अपना दिवाना बनाया तब 'मोहम्मद अजीज' के नाम से जाने गए।

जिंदगी के हर रंग में रंगे गाने

आज भी डीजे फ्लोर पर साल 1987 की फिल्म 'खुदगर्ज' का गाना 'मय से मीना से ना साकी से…' जरूर बजता है। मोहब्बत का इजहार करना हो तो साल 1991 की फिल्म 'हम' का गाना 'कागज कलम दवात लालिख दूं दिल तेरे नाम करूं…' गुनगुना देते हैं। जब हम रूठे हुए दोस्त को मनाते हैं तो साल 1990 की फिल्म 'स्वर्ग' का गाना 'ऐ मेरे दोस्त लौट के आजाबिन तेरे जिंदगी अधूरी है.. याद आ ही जाता है। देश के नाम गीत गाना हो तो साल 1986 की फिल्म 'कर्मा' का गाना 'हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए…' होठों पर न आए ऐसा हो नहीं सकता। साल 1986 की ही फिल्म 'अमृत' का गाना 'दुनिया में कितना गम है…' सुनते हैं तो अपने दुख भूल जाते हैं और साल 1985 की फिल्म 'आखिर क्यों' का गाना 'एक अंधेरा लाख सितारे…' जिंदगी के संघर्षों से लड़ने की हिम्मत देता है।

'सातवें सुर' के सिंगर

आज कहानी संगीत के 'सातवें सुर' में आसानी से गा सकने वाले सिंगर मोहम्मद अजीज की। जो हर किसी के दिल के बेहद अजीज थे। 17 साल के करियर में 20 हजार से ज्यादा गाने गाए। इनके गीतों को बजाकर लोगों ने अपने टेप रिकॉर्डर तक घिस दिया। इनकी आवाज ट्रक-टेपों और बसों से लंबी-लंबी यात्रा कर रहे लोगों की साथी बनींमोहल्लों-गलियों से होते हुए बड़े बड़े चौराहों तक पहुंची। पर अफसोस इन्हें न फिल्मफेयर मिला और न ही कभी कोई नेशनल अवार्ड। जिंदगी के आखिरी दिनों में गुमनामी सिवा कुछ नहीं था। पर ज़िंदगी के आखिरी वक्त तक जिंदादिली से रहते। ये समझने के लिए उनके अतीत में झांकना होगा।

रफी साहब को मानते गुरु, होटल में गाना गाया मिला मौका

मोहम्मद अजीज पढ़ाई के दौरान स्कूल के कल्चरल प्रोग्राम्स में गाते तो तारीफें मिलती। लगा कि संगीत में करियर बनाएंगे। पर इतना आसान नहीं था। घर में पैसों की तंगी थी उन्होंने एकलव्य की तरह मोहम्मद रफी को द्रोणाचार्य के रूप में गुरु माना और रेडियो पर उनके गाने सुनकर सीखा। बड़े हुए तो परिवार की जिम्मेदारी बढ़ी। कोलकाता के रेस्टोरेंट्स और होटल्स में गाने को मजबूर हुए। पर ये मजबूरी फायदा लेकर आई। वो तब मोहम्मद रफी के गाने सुनाया करते। वाहवाही भी मिलतीकभी-कभी अच्छी बख्शीश मिल जाती और एक दिन फिल्म में गाने का मौका भी मिला। दरअसल वो जिस रेस्तरां में गाते वहां बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी आते थे। एक दिन फिल्म प्रोड्यूसर असिस रे के कानों पर मोहम्मद अजीज की आवाज पड़ी तो उन्होंने डायरेक्टर शब्दा कुमार की साल 1984 की फिल्म 'ज्योति' में गाने का मौका दिया। इस फिल्म में उनके दो गाने थे जो पसंद किए गए।

ख्वाबों में पंख लगाने को रुख किया मुंबई का

मुंबई में उनकी मुलाकात इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद कर रहे संगीतकार अनु मलिक से हुई। साल 1985 की अमिताभ बच्चन की फिल्म 'मर्द' में अनु मलिक संगीत दे रहे थे उन्होंने मोहम्मद अजीज को फिल्म का टाइटल गीत' मर्द तांगेवाला…' गाना गाने का मौका दिया। गाना सुपरहिट हुआ और मोहम्मद अजीज की गाड़ी चल निकली। अपने दौर में शायद ही कोई एक्टरसिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर होगा जिनके साथ इन्होंने काम न किया हो। लेकिन इन्हें सबसे ज्यादा गाने का मौका संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने दिया। इस जोड़ी के साथ मोहम्मद अजीज ने करीब 30 फिल्मों के गीतों को अपनी आवाज दी। 'इमली का बूटा बेरी का पेड़…', 'मेरे दो अनमोल रतन…', 'माई नेम इज लखन…' और 'तुझे रब ने बनाया किस लिए…' जैसे गाने गाने वाले सिंगर मोम्मद अजीज ने बंगाली और उड़िया फिल्म इंडस्ट्री में हुई बेहद ऊंचा नाम बनाया।

पर वक्त एक जैसा नहीं रहता

80 और 90 के दशक के बेहतरीन गायकों में शुमार मोहम्मद अजीज को भी चमकते सूरज की तरह ढलना पड़ा। उदित नारायणकुमार सानू जैसे नए गायकों का दौर आ चुका था।संगीत की दुनिया में बहुत तेजी से हो रहे बदलावों की इस दौड़ में मोहम्मद अजीज बेहद पीछे छूट गए। अपने गुरु मोहम्मद रफी की तरह ही मोहम्मद अजीज कभी भी किसी की बुराई करते नहीं मिले। आखिरी दिनों तक वो सभी के शिकवे गिले भुला चुके थे। पास थी तो सिर्फ गुमनामी। इन्हें काम मिलना बंद हो गया था। पर इनका जलवा लाइव शोज़ में हमेशा बरकरार रहा। ऐसे ही कोलकाता में हुए एक म्यूजिक कॉन्सर्ट को पूरा कर मुंबई लौट रहे थे। एयरपोर्ट पर हार्ट अटैक आया। 27 नवंबर साल 2018 64 की उम्र में बेहद शानदार आवाज हमेशा हमेशा के लिए शांत हो गई।

'अजीज की आवाज किसी सावन की तरह'

इनके निधन के बाद पत्रकार रवीश कुमार मोहम्मद अजीज को श्रद्धांजलि देते हुए एक लेख में लिखते हैं कि 'एक उदास और खाली दौर में अजीज की आवाज सावन की तरह थी। सुनने वालों ने उनकी आवाज को गले लगाया पर उन्हें उसका श्रेय नहीं दिया। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर भी ये गायक बड़ा गायक नहीं माना गया जबकि उनके गाने की शास्त्रीयता कमाल की थी। अजीज गा नहीं सकने वालों के गायक थे। उनकी नकल करने वाले आपको कहीं भी मिल जाएंगे। उनकी आवाज दूर से आती लगती है। जैसे बहुत दूर से चली आ रही कोई आवाज करीब आती जा रही हो। कई बार वो करीब से दूर ले जाते थे।'

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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