Murlikant Petkar : ये हैं रियल 'चंदू चैंपियन'

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ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी...

साल था 1965जगह इंडियन आर्मी बेस कैंपजम्मू-कश्मीर भारत और पाकिस्तान में जंग शुरू हो चुकी थी। दोपहर का वक्त था, एक जवान अपने बेस कैंप से चाय पीने के लिए बाहर निकाला। तभी पाकिस्तान की तरफ से हवाई हमला हो गया। अलर्ट अलार्म सुनकर उस जवान ने अपनी पोजीशन लेनी चाही लेकिन तबकत पाकिस्तानी सैनिकों ने हवाई फायरिंग शुरू कर दी। उस जवान के शरीर को नौ गोलियों ने छलनी कर दिया। एक ट्रक ने उनके पैर को कुचल डाला। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। जान तो बच गई पर वो कौमा चले गए। शायद उनका कोई सपना अभी पूरा नहीं हुआ था। इसलिए ये कहानी खत्म नहीं हुई थी।

किसी फिल्म से कम नहीं पूरी जिंदगी

ये रियल कहानी है, पर किसी फिल्म से कम नहीं लगती। इसलिए इस जवान की जिंदगी से प्रेरित होकर डायरेक्टर कबीर खान ने ‘चंदू चैम्पियन’ टाइटल से फिल्म बनाई है। फिल्म में उस जवान का किरदार एक्टर कार्तिक आर्यन ने निभाया है जिनका असल नाम है – मुरलीकांत पेटकर। वो जिनका जिंदा बचना चमत्कार से कम नहीं था। एक गोली आज भी उनके स्पाइनल कॉर्ड धंसी है। कोमा में रहे। होश आया तो याददाश्त खो चुके थे। फिर वो किया जिसकी कल्पना कर पाना मुश्किल था। वो अपने जज्बे और कड़ी मेहनत के दम पर भारत के लिए पहला पैरालंपिक गोल्ड मेडल लेकर आए। लेकिन भारत सरकार से सम्मान की चाहत पूरी होने में 36 साल का लंबा वक्त लगा। आज कहानी मुरलीकांत पेटकर की जो घर से भाग गए। मुट्ठी में कुश्ती में जीते 12 रुपये लेकर, मन में कई सवाल लेकर और साथ में मेहनत और जस्बा लेकर।

कुश्ती में प्रधान के लड़के पछाड़ा और फिर घर से भागे

ये आजादी से पहले का भारत था। महाराष्ट्र के सांगली जिले का पेठ इस्लामपुर गांव। यहां एक साधारण परिवार में 1 नंवबर, साल 1944 को एक लड़के का जन्म हुआ। माता-पिता ने नाम रखा - मुरलीकांत पेटकर। पढ़ाई में तो ठीक-ठाक पर खेलकूद क इस कदर जूनून कि गांव के मैदान में ही नजर आते। साल 1956। 12 साल की उम्र में गांव में हो रही एक कुश्ती में हिस्सा। जिसमें गांव के प्रधान का बेटे को पछाड़ दिया। जीत के इनाम के रूप में 12 रुपये मिले। इन्हें लगा कि शायद गांव वाले उनकी पीठ थपथपाएगें। लेकिन हुआ इसका उल्टा। दरअसल, देश आजाद तो हो गया था पर अभी भी गांवों में प्रधान और बड़े जम्मीदारों का प्रभाव था। आखिर प्रधान के बेटे को हराया था। प्रधान के समर्थकों ने मुरलीकांत पेटकर के परिवार को डराया धमकाया। वो दुखी हुए। फैसला किया कि गांव से भाग जाएंगे। स्टेशन पर खड़ी मालगाड़ी में चढ़ गए। मन में कई सवाल थे क्या वो अपना सपना पूरा कर पाएंगेक्या वो घर से भागकर सही कर रहे हैं। लेकिन मालगाड़ी में चढ़ने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1965 की वार ने बदल दी पूरी जिंदगी

18 साल की उम्र में इंडियन आर्मी में भर्ती हुए। खेल के लिए दिवानगी थी तो आर्मी की नौकरी के दौरान ही बॉक्सिंग करनी शुरू कर दी। साल 1964 में टोक्यो में इंटरनेशनल सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में एक मेडल अपने नाम किया। लेकिन कहते हैं जिंदगी में जैसा चाहो वैसा कम ही होता है। इनके साथ भी ऐसा हुआ। साल 1965। भारत-पाकिस्तान जंग छिड़ चुकी थी। जम्मू और कश्मीर बेस कैंप हमला हुआ तो वहां तैनात मुरलीकांत पेटकर के शरीर को 9 गोलियों ने छलनी किया। एक ट्रक उनके पैरों से गुजर गया। साथी फौजियों ने अस्पताल में भर्ती कराया। जान तो बच गई पर ये याददाश्त खो बैठे। फिर एक चमत्कार हुआ एक दिन वो बेड से गिर पड़े और याददाश्त वापस आ गई। सपने को पूरा करने और जिंदगी जीने की ख्वाहिश ही थी कि अपनी रिकवरी पर काम किया। स्विमिंग सिखी और दो साल के अंदर बेहतर हो गए। सब ठीक था पर शरीर का निचला धड़ काम नहीं करता।

अपनी मुश्किल को नहीं बनने दिया रोड़ा

साल 1967 में डिस्चार्ज होने के बाद में शॉट-पुट, जैवेलिन थ्रो, डिस्कस थ्रो, वेटलिफ्टिंग, टेबल टेनिस और तीरंदाज़ी जैसे खेलों में महाराष्ट्र स्टेट चैम्पियन बने। साल 1969 में उन दिनों टाटा कंपनी जंग में विकलांग हुए जवानों की मदद कर रही थी। व्यक्तित्व से स्वाभिमानी मुरलीकांत पेटकर भी आर्मी से रिटायर हो चुके थे फिर भी उन्होंने टाटा से मदद लेने से इंकार कर दिया और कहा कि, मदद करनी है तो नौकरी दो। उनकी इस बात से प्रभावित होकर मेनेजिंग स्टाफ ने उन्हें टेल्को में नौकरी दी। पर अभी भी सपना पूरा नहीं हुआ था।

मदद के आगे आए विजय मर्चेंट

कहते हैं जब इंसान कुछ करना चाहे तो भगवान भी मदद करते हैं। मुरलीकांत की मदद के लिए आगे आए क्रिकेटर विजय मर्चेंट। विजय मर्चेंट NGO से जुड़े हुए थे। उनकी NGO ने मुरलीकांत पेटकर की स्पोस्टर्स ट्रेनिंग का पूरा खर्चा उठाया। साल 1972। मुरलीकांत पेटकर को जर्मनी के हीडलबर्ग पैरालंपिक में देश को रिप्रेजेंट करने का मौका मिला। और जब उन्होंने स्विमिंग पूल में छलांग लगाई तो बाहर हाथों में सोना लेकर ही निकले। उन्होंने 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी के लिए भारत को पहला पैरालंपिक स्वर्ण पदक दिलाया।

36 साल बाद मिला सरकार से सम्मान

भारत के लिए गोल्ड जीतकर उन्होंने देशवासियों का दिल भी जीता। उन्हें इंतजार था कि भारत सरकार भी उन्हें सम्मानित करगी। साल 1982 में उन्होंने चिट्ठी लिखकर खुद को अर्जुन अवार्ड का दावेदार भी बताया लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। इसके बाद फैसला किया कभी सम्मान की भीख नहीं मांगेंगे। पर प्रतिभावान को सम्मान जरूर मिलता है। 36 साल बाद साल 2018 में भारत सरकार ने मुरलीकांत पेटकर को पद्मश्री से नवाजा। सरकार से सम्मानित होकर शायद उनकी जिंदगी की आखिरी कसर भी दूर हो गई।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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