Music Director Madan Mohan : एक ग़म जिसने जिंदगी भर सताया

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जब सम्मान मिलने का नहीं हुआ यकीन

साल 1971, जगह मुंबई का एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो। जहां सिंगर मोहम्मद रफी, लिरिसिस्ट राजेंद्र किशन अपने फेवरेट म्यूजिक डायरेक्टर के साथ कुछ धुनों पर डिस्कस कर रहे थे। तभी फोन की घंटी बजती है। म्यूजिक डायरेक्टर फोन उठाते हैं दूसरी तरफ से आवाज आती है। 'पिताजी, मैं संजीव बोल रहा हूं।' म्यूजिक डायरेक्टर बोलते हैं। 'अभी एक धुन पर काम कर रहा हूं, बाद में बात करो?' बेहद उत्साह भरी आवाज में बेटे संजीव कोहली कहते हैं 'नहीं पिताजी, आपको एक खबर देनी है, खबर इतनी अच्छी है कि इसके बदले आप मुझे हजार रुपये भी दे देंगे' म्यूजिक डायरेक्टर कहते हैं 'बरखुरदार, अगर खबर किसी काबिल नहीं हुई तो बहुत मार पड़ेगी।' बेटे संजीव कोहली कहते हैं कि 'मारना छोड़िए, आप मुझे गले लगा लेंगे।' संजीव कोहली कहते हैं 'पिताजी, इस बार फिल्म 'दस्तक' के लिए आपको बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का नेशनल अवार्ड मिला है।'

जब लगा लड़का मजाक कर रहा है

ये सुनकर कुछ सैकेंड की चुप्पी थी। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। लगा कि लड़का मज़ाक कर रहा है। यकीन होता भी कैसेक्योंकि पिछले 20 साल के करियर में एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने देने के बावजूद भी उन्हें किसी भी तरह के कोई अवॉर्ड नवाजा नहीं गया था। 20 सालों में ये पहली बार था जब उन्हें कोई सम्मान दिया जा रहा था। 20 सालजिसमें कड़ा संघर्ष और जीतोड़ मेहनत है। बल्कि 20 ही क्योंम्यूजिक डायरेक्टर मदन मोहन की पूरी जिंदगी की दास्तां ही बेहद दिलचस्प है। शानदार म्यूजिकबढ़िया कम्पोज़ीशन पर उन्हें लगा कि उनके काम की वो कद्र नहीं हुई जिसके वो हक़दार थे।

बगदाद में हुआ जन्म

20 का दशक। पंजाब के बेहद समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखने वाले रायबहादुर चुन्नीलाल कोहली अपनी पत्नी भगवंती देवी के साथ इराक के बगदाद शहर में रहते थे। दरअसल रायबहादुर चुन्नीलाल ब्रिटिश पुलिस में अकाउंटेंट थे। इसके दो बेटे और एक बेटी थी जिसमें एक थे 25 जूनसाल 1924 को बगदाद में जन्मे मदन मोहन कोहली। साल 1932। जब इराक को अंग्रेजों से आजादी मिली। रायबहादुर चुन्नीलाल से कहा गया कि 'आप या तो इराकी नागरिकता लें या फिर नौकरी से इस्तीफा देकर भारत आएं।उन्होंने नौकरी छोड़ी और भारत गए। कुछ दिन अपने गांव पंजाब में रुके फिर लाहौर चले गए। दरअसल उन्होंने फिल्मकार हिमांशू राय के साथ मिलकर बॉम्बे टॉकीज की नींव रखी। जब फिल्म निर्माण का केंद्र कोलकाता से हटकर मुंबई बना तो बॉम्बे टाकीज को भी मुंबई शिफ्ट किया।

पिताजी की जिद की वजह से फौज में हुए भर्ती

अब राय बहादुर चुन्नीलाल पूरे परिवार के साथ मुंबई आ गए। ठिकाना बना मरीन ड्राइव। उन्ही के घर के पास एक्ट्रेस नरगिस की मां जद्दन बाई का भी घर था। जद्दन बाई फेमस एक्ट्रेस और सिंगर रही है। उनके घर कलाकारों का आना जाना लगा रहता। संगीत की महफिलें सजती। मदन मोहन भी वहां जाते तो उन्हें फिल्मों में दिलचस्पी बढ़ी। लेकिन फिल्मों से जुड़े होने के बाद भी पिता नहीं चाहते थे कि मदन मोहन फिल्मों में काम करें। वो चाहते थे कि बेटा फौज में भर्ती हो। और साल 1941 में देहरादून के कर्नल ब्राउन मिलिट्री हाई स्कूल में एडमिशन लिया। साल 1943 में 19 साल की उम्र में सेना में शामिल हुए। पहली पोस्टिंग मिली बंगलौर।

जब किया मुंबई का रुख

एक इंटरव्यू में मदन मोहन बताते हैं कि 'मैं एक लेफ्टिनेंट के रूप में सेना में काम कर रहा था। में शारीरिक रूप से फिट थालेकिन स्वभाव से मेरा दिल कहीं और था मैं फिल्मों में काम करना चाहता था।साल 1945। सेना से इस्तीफा देकर बतौर एक्यूटिव प्रोग्रामर ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ में काम करने लगे। ये वो वक्त था जब बड़े-बड़े संगीतकारों से रूबरू हो रहे थे। वो खुद भी संगीत कार्यक्रम पेश करते। जिन्हें पसंद किया जाता पर ये भी नौकरी छोड़ दी। वजह बना उनका तबादला। दिल्ली के ऑल इंडिया रेडियो पर उन्हें टेबल वर्क करना था। उन्हें लगा ये काम उनके लिए नहीं है। ये वो दिन थे जब एक्टर और सिंगर कुंदन लाल सहगल स्टार हुआ करते थे। मदन मोहन भी उन्हीं की तरह बनने का ख्वाब लिए साल 1947 में मुंबई आ गए।

जब पिता ने घर से निकाला दिया

उधर पिता रायबहादुर चुन्नीलाल जो फिल्म इंडस्ट्री में नाम बना चुके थे। जब उन्हें पता चला मदन मोहन ने नौकरी छोड़ दी है। तो उन्होंने मदन मोहन को घर से निकाल दिया। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का दौर। मदन मोहन रेडियोनाटकों में काम करते पर जो पैसे कमाते वो पूरे नहीं पड़ते। कई दिनों तक भूखे रहे। फुटपाथ पर सोए। रातों में बिना किसी वजह घूमा करते। एक इंटरव्यू में मदन मोहन बताते हैं कि 'एक वक्त वो भी आया जब में लगातार पांच दिनों तक भूखा रहना रहा। लेकिन मैंने किसी से मदद नहीं मांगी। मैंने तब तक संघर्ष जारी रखा जब तक ब्रेक नहीं मिल गया।'

पिताजी से मिली तारीफें

साल 1948 की फिल्म 'शहीदमें एक छोटा सा रोल मिला और इसी फिल्म में लता मंगेशकर के साथ एक गीत गाने का मौका मिला। पर किस्मत ये गाना रिलीज नहीं हुआ। साल 1950 फिल्म 'आंखेंमें बतौर म्यूजिक कंपोजर उन्हें पहला ब्रेक मिलाये फिल्म तो नहीं चली पर गाने पोपुलर हुए। पिताजी रायबहादुर चुन्नीलाल ने भी इस फिल्म का प्रीमियर देखा तो बेहद भावुक होकर मदन मोहन से बोले 'बेटाक्या खूब संगीत दिया हैमैंने तुम पर कभी भरोसा नहीं किया।इसके बाद कुछ वक्त बाद पिताजी दुनिया छोड़कर चले गए। पिता से तारीफें मिल गई थी।

सम्मान न मिलने का सता रहा था गम

1962 की फिल्म 'अनपढ़' – 'आप की नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे।' 1964 की फिल्म 'वो कौन थी' - 'लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो।' 1964 की फिल्म 'हक़ीक़त' - 'कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियों।जैसे गाने रचने के बाद भी उन्हें तब वो सम्मान नहीं मिल रहा था। जिससे वो हकदार थे। कोई भी फिल्मफेयर अवार्ड न मिलने का ग़म उन्हें सता रहा था। वो डिप्रेस रहने लगेख़ूब शराब पीतेइस वजह से उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया।

गानें हुए पॉपुलर पर वो नहीं थे

बीमार रहने के बाद भी वो अपने काम से कभी कंप्रोमाइज नहीं करते। यही वजह रही कि गुलज़ार ने अपनी साल 1975 की फिल्म 'मौसमके लिए मदन मोहन को साइन किया पर रिलीज़ हुई उसके गाने बेहद पॉपुलर हुए। इस फिल्म के गाने दिनभर रेडियो बजाए जाते है। पर अफसोस से सब वो देख नहीं पाए। 14 जुलाई साल 1975 मदन मोहन ने 51 साल की उम्र में दुनिया से अलविदा ले लिया। साल 1976 की फिल्म 'लैला मजनूके गाने भी बंबर सुपर हिट हुए। साल 2004 की फिल्म 'वीर जीरामें भी उन्ही धुनों पर ही गानें लिखे गए। जिसे बेहद पॉपुलैरिटी मिली। ये कुदरत का खेल ही था। जिन्हें जिंदगी पर सम्मान की चाह रही उनके जाने बाद उनके गानों को वो पॉपुलैरिटी मिली जिन्हें वो हमेशा पाना चाहते थे।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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