Ustad Bismillah Khan : सफलता आसमानी, जिंदगी जमीनी

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पूरे पांच वक्त के नमाजी

एक शिया मुसलमान, पूरे पांच वक्त के नमाजी, जकात देते और हज करने भी जाया करते। रमजान में रोजा तो रखते ही अपने मजहब के साथ गैर मजहब की संस्कृति और त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लेते। क्योंकि उनका एक ही धर्म था - संगीत। वो काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते। वो गंगा किनारे बैठकर घंटों रियाज किया करते। फिर उस्ताद बिस्मिल्लाह को दुनिया में बेहतरीन शहनाई वादक के रूप में जाना गया।

बाबा ने रखा नाम - बिस्मिल्लाह खान

पैगम्बर बक्स खान, जो एक शिया मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते। बिहार के डुमरांव एस्टेट के टेढ़ी बाजार में एक किराए कमरे में अपनी पत्नी मिट्ठनबाई के साथ रहते और  महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते। इन्ही के घर दूसरी संतान के रूप में 21 मार्च साल 1916 को एक बेटे का जन्म हुआ। बड़े भाई के नाम शम्सुद्दीन खान के अनरूप नाम रखा गया - कमरुद्दीन खान। ऐसा कहा जाता है - जब कमरुद्दीन खान को इनके बाबा रसूल बक्स खान ने देखा तो उनके जुंबान से निकला – 'बिस्मिल्लाह' यानी 'अल्लाह के नाम से' और तब से कमरुद्दीन खान का नाम बिस्मिल्लाह खान हो गया।

'मेरी एक दूसरी पत्नी भी है – शहनाई।'

साल 1932 उम्र 16 साल की हुई तो उनका निकाह हो गया। मुग्गन ख़ानम से। उनके कुल नौ बच्चे हुए। वो कभी-कभी हल्के फुल्के मजाकिया अंदाज में कहते 'मेरा घर, घर नहीं है एक होटल है।' दरअसल उनके परिवार में कुल 66 लोग थे जो एक साथ रहते। बिस्मिल्लाह खान अपनी पत्नी मुग्गन खानम से खूब प्रेम करते। लेकिन वो अक्सर ये भी कहते कि 'मेरी एक दूसरी पत्नी भी है – शहनाई।' दरअसल, बिस्मिल्लाह खान छह साल की उम्र तक पिता पैगंबर खान से शहनाई बजाना सीखते थे। इसके बाद वो साल 1922 में बनारस आ गए। यहां मामा अलीबख्श विलायती खान बाबा विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते। बिस्मिल्लाह खान ने उन्हीं से शहनाई बजाने की तालीम ली। और यही से बिस्मिल्लाह खान का उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बनने का सफर शुरू होता है।

दुनिया के हर कोने में किए कॉन्सर्ट

सात से आठ घंटे रोज रियाज करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे। पहली बार साल 1930 में इलाहाबाद के एक संगीत सम्मेलन में अपनी प्रस्तुति दी। साल 1937 में कोलकाता में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में शहनाई बजाई तो पूरे देश में सुर्खियों बटोरीं। फिर वो दौर भी आया जब अमेरिका, यूरोप, इराक, ईरान, कनाडा दुनिया के हर कोने में अपने कॉन्सर्ट किए।

जब लाल किले पर बजाई शहनाई

साल 1947 । देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि आजादी की पहली सुबह का स्वागत उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई बजाकर करें। बिस्मिल्लाह इस बड़े अवसर पर शहनाई बजाने का मौका मिलने पर खुश थे, लेकिन उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से कहा कि 'मैं लाल किले पर चलते हुए शहनाई नहीं बजा पाउंगा।' तब जवाहर लाल नेहरू ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से कहा, 'आप लाल किले पर एक साधारण कलाकार की तरह नहीं चलेंगे। आप आगे चलेंगे। आपके पीछे मैं और पूरा देश चलेगा।इसके बाद बिस्मिल्लाह खान ने राग काफी बजा कर आजादी की उस सुबह का स्वागत किया। साल 1997 में जब आजादी की 50वीं सालगिरह मनाई गई तो बिस्मिल्लाह खान को लाल किले की प्राचीर से शहनाई बजाने के लिए फिर आमंत्रित किया गया।

चारों सर्वोच्च नागरिक सम्मान वाले एक ही कलाकार

1956 - संगीत नाटक एकेडमी

1961 – पद्मश्री

1968 - पद्म भूषण

1980 - पद्म विभूषण

2001 - भारत रत्न

सफलता ने कदम चूमे, जिंदगी सादगी से भरपूर

एक बार वो इंटरव्यू दे रहे थे। वो इंटरव्यू देने से पहले जो लुंगी पहने थे वो ही लुंगी पहने हुए इंटरव्यू देने लगे। दरअसल उनकी लुंगी फटी हुई थी तभी उनकी एक शिष्या ने उन्हें टोका कहा 'आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, आपको तो भारत रत्न मिल चुका है, आप फटी लुंगी पहनेंगे तो गलत संदेश जाएगा।' वरिष्ठ फिल्म समीक्षक यतींद्र मिश्र 'यतीन्द्र की डायरी' में लिखते हैं कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी शिष्या को समझाते हुए कहते हैं, 'पगली मुझे भारत रत्न शहनाई बजाने पर मिला है, फटी हुई लुंगी से उसका क्या ताल्लुक। तू कह रही है तो लुंगी बदल लेता हूं।' खुदा से हमेशा प्रार्थना करना कि वो हमेशा सच्चा सुर बख्शे। कोई फटा हुआ सुर न बख्शे। अगर खुदा ने एक गलत सुर बख्श दिया तो जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। लुंगी का क्या है, आज फटी है कल सिल जाएगी।'

अपने वतन से करते बेहद प्यार

जब पेशकश की गई थी कि 'आप अमेरिका में ही आकर बस जाओ, आपको सारी सुविधाएं मिलेंगी।' तो उन्होंने मना कर दिया कहा कि 'बनारस में गंगा है, काशी विश्वनाथ हैं, बालाजी का मंदिर है, मैं इन सबसे बिछड़ना नहीं चाहता हूं।' सर्दियों में वो अपने घर के आंगन में चारपाई पर बैठते, धूप का आनंद लेते और उनके पीछे तार पर उनके कपड़े सूख रहे होते। जूही सिन्हा अपनी किताब 'बिस्मिल्लाह खान - बनारस के उस्ताद' में लिखती हैं कि, 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने ताउम्र अपने कपड़े खुद धोए। हमेशा बिना प्रेस किए हुए कपड़े पहने। उनके कमरे में एक चारपाई और बिना गद्दे वाली कुर्सी के अलावा कुछ नहीं। किसी ने उनके कमरे में एक कूलर लगवाने की पेशकश की। पर ये कहते हुए मना कर दिया कि यही पैसे गरीब विधवाओं को दे दिए जाएं।'

फिल्म में भी बजाई शहनाई

साल 1959 की फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' के लिए शहनाई बजाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने कभी कार नहीं खरीदी, हमेशा रिक्शे से चले। कभी शराब नहीं पी। हां कभी-कभी वो एकाध सिगरेट जरूर पी लिया करते थे। 17 मार्च साल 2006 को तबीयत खराब हुई बनारस के अस्पताल में भर्ती कराया गया। वो चाहते थे इंडिया गेट पर शहनाई बजाकर शहीदों को श्रद्धांजलि दूं लेकिन ये आखिरी ख्वाहिश अधूरी रह गई। 21 अगस्त साल 2006 90 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा गए कह। उनके निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक हुआ। भारतीय सेना ने 21 तोपों की सलामी दी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को पुराने बनारस के फतेमान कब्रिस्तान में दफन किया गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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